श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक सर्वे की याचिका पर दिया ये आदेश

श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक सर्वे की याचिका पर दिया ये आदेश
फोटो कोलाज: यूपी तक

मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वैज्ञानिक सर्वे कराए जाने की मांग को लेकर दाखिल की गई याचिका पर जिला अदालत को सुनवाई करने के आदेश दिए हैं. हाईकोर्ट ने जिला अदालत को दाखिल की गई अर्जी पर 3 महीने में निर्णय लेने का आदेश दिया है. भगवान श्रीकृष्ण विराजमान की तरफ से ये याचिका हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी. इस याचिका पर सोमवार को जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की कोर्ट में सुनवाई हुई.

अहम बिंदु

अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद मथुरा की जिला अदालत को आदेश दिया है. इस अर्जी के खिलाफ यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की याचिका पर भी हाईकोर्ट ने जिला अदालत को 3 महीने में फैसला सुनाने का आदेश दिया है. अदालत ने जिला अदालत को कहा है कि दोनों अर्जियों पर एक साथ सुनवाई की जाए.

गौरतलब है कि मथुरा की अदालत में पिछले साल एक अर्जी दाखिल कर विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराए जाने की मांग की गई थी. यह याचिका मथुरा की अदालत में अभी लंबित है. इस याचिका पर यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने जवाब दाखिल करते हुए इसे खारिज किए जाने की मांग की है.

यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने आदेश 7 नियम 11 के तहत याचिका को खारिज किए जाने की मांग की थी और उसकी पोषणीयता पर सवाल उठाया था. मथुरा में दाखिल की गई याचिका पर जल्द सुनवाई किए जाने और हाईकोर्ट द्वारा सीधा आदेश दिए जाने की मांग को लेकर एक याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी इसी महीने दाखिल की गई थी.

जानिए क्या है ऑर्डर 7 नियम 11

सीपीसी (सिविल प्रक्रिया संहिता) का ऑर्डर 7 नियम 11 ये कहता है कि जबसे ये एक्ट लागू हुआ है तब से ऐसा कोई भी वाद अदालत में जा ही नहीं सकता है. ये ऑर्डर 7 नियम 11 निषिद्ध करता है ऐसे वाद को अदालत तक जाने में.

आदेश 7, सीपीसी का नियम 11 एक ऐसा नियम है जिसे 'वादों की अस्वीकृति पर कानून' कहा जाता है. सीधे शब्दों में कहें तो, गुण-दोष के आधार पर मामले की सुनवाई करने से पहले न्यायालय को यह विचार करना आवश्यक है कि क्या वादपत्र में मांगी गई राहत (जिस पक्ष ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है वह क्या मांग रहा है) को भी न्यायालय द्वारा प्रदान किया जा सकता है. यदि न्यायालय को लगता है कि उनके द्वारा मांगी गई राहत में से कोई भी राहत नहीं दी जा सकती है, तो वाद को सुनवाई से पहले ही अस्वीकार कर दिया जाता है.
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