Robertsganj Election 2027: पूर्वांचल की अहम सीटों में गिनी जाने वाली रॉबर्ट्सगंज विधानसभा एक बार फिर राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है. 2014 के बाद से इस क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी अपना दल का दबदबा रहा है. लोकसभा स्तर पर यह सीट लगातार एनडीए के खाते में जाती रही लेकिन विधानसभा में मुकाबला हमेशा कड़ा रहा है. पिछला चुनाव महज 5600 वोटों के अंतर से तय हुआ था जिससे साफ है कि यहां की लड़ाई एक-एक वोट पर टिकती है. 2027 के चुनाव से पहले एक बार फिर यहां सियासी सरगर्मी तेज हो गई है.
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5600 वोटों की जीत और BJP का दावा
पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी भूपेश चौबे ने करीब 5600 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी. वे 2017 के बाद से इस सीट को भाजपा के मजबूत गढ़ के रूप में देखते हैं. उनका कहना है कि वे “सबका साथ, सबका विकास” के नारे पर काम कर रहे हैं और क्षेत्र में विकास कार्यों को प्राथमिकता दी गई है.
भूपेश चौबे के अनुसार, उनके कार्यकाल में सड़कों का निर्माण, सिंचाई की सुविधाएं, छोटी-छोटी बंदियों (चेक डैम) का निर्माण, वनाधिकार पट्टों का वितरण और आवास योजनाओं का लाभ लोगों तक पहुंचाया गया है. वे दावा करते हैं कि हर गांव में खेल मैदान और हर ब्लॉक में मिनी स्टेडियम की दिशा में काम हो रहा है. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के साथ-साथ रोजगार के लिए निवेश भी लाया गया है जिसमें पानी के माध्यम से बिजली उत्पादन जैसी योजनाएं शामिल हैं. उनका कहना है कि वे लगातार जनता के बीच रहकर उनके सुख-दुख में सहभागी बने हुए हैं.
विपक्ष ने किया पलटवार
पिछले चुनाव में महज 5600 वोटों से हारने वाले अविनाश कुशवाहा इस बार मुकाबले को और मजबूत मान रहे हैं. उनका आरोप है कि पिछली बार प्रशासनिक और राजनीतिक समीकरण उनके खिलाफ रहे जिसके चलते वे चुनाव हार गए. उनका कहना है कि अगर उन्हें कुछ हजार वोट और मिल जाते तो परिणाम बदल सकता था.
अविनाश कुशवाहा का दावा है कि क्षेत्र में जनता अपने कामों को लेकर परेशान है. उनके मुताबिक चौकी, थाना, तहसील और ब्लॉक स्तर पर आम लोगों की समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा है. वे कहते हैं कि जनता झूठे वादों और नारों से त्रस्त हो चुकी है और 2027 में बदलाव का मन बना चुकी है.
क्या कहते हैं जातीय और सामाजिक समीकरण?
रॉबर्ट्सगंज विधानसभा में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 3,57,000 बताई जाती है. यहां मिश्रित आबादी है, जिसमें आदिवासी समुदाय की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है.
एक अनुमान के अनुसार ब्राह्मण मतदाता लगभग 50,000 हैं. दलित और वैश्य वर्ग की संख्या करीब 45-45 हजार है. कुर्मी और कुशवाहा समुदाय के लगभग 20-20 हजार मतदाता हैं, जबकि मुस्लिम मतदाता भी करीब 20,000 हैं. कोल-भील समुदाय की संख्या लगभग 15,000 और क्षत्रिय भी करीब 15,000 हैं. यादव मतदाता करीब 12,000 और चेरो समुदाय के लगभग 10,000 लोग हैं. इसके अलावा खरवार और गोंड समुदाय के भी हजारों मतदाता इस सीट पर प्रभाव डालते हैं. स्थानीय जानकारों का मानना है कि इस सीट पर आदिवासी भावनाएं और भाजपा का पारंपरिक वोट बैंक कितना एकजुट रहता है यह परिणाम तय करने में निर्णायक होगा.
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