Naseemuddin Siddiqui: उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो गई है. समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अपने कुनबे को लगातार धार दे रहे हैं. इसी कड़ी में एक ऐसा नाम सपा के साथ जुड़ा है जो कभी बहुजन समाज पार्टी के साम्राज्य का स्तंभ माना जाता था. दशकों तक मायावती के राइट हैंड रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब अखिलेश यादव की पार्टी सपा में शामिल हो चुके हैं.
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कौन हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी?
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है.मूल रूप से बांदा के रहने वाले सिद्दीकी कभी राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी और रेलवे ठेकेदार हुआ करते थे. 1988 में बांदा नगर पालिका अध्यक्ष का चुनाव लड़ा लेकिन हार गए. 1991 में बसपा के टिकट पर बांदा सदर से विधायक बने. वह बांदा के इतिहास के पहले मुस्लिम विधायक थे. 1995 में जब मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनीं तो सिद्दीकी कैबिनेट मंत्री बने. इसके बाद वह दशकों तक संगठन और सरकार में दूसरे सबसे ताकतवर शख्स बने रहे.
मायावती के लिए जेल गए पर फिर क्यों आई 'दरार'
एक दौर था जब सिद्दीकी, मायावती के लिए ढाल बनकर खड़े रहते थे. 2016 का वह वाकया आज भी सियासी गलियारों में गूंजता है. जब बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह की अभद्र टिप्पणी के खिलाफ सिद्दीकी ने मोर्चा खोला था.मायावती के सम्मान में सिद्दीकी हजरतगंज में धरने पर बैठे विवादित बयान दिए और जेल तक गए. 2017 के चुनावों में बसपा की करारी हार (महज 19 सीटें) के बाद समीकरण बदल गए.
सतीश चंद्र मिश्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सिद्दीकी पर भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के आरोप लगाकर उन्हें पार्टी से निकाल दिया.पलटवार करते हुए सिद्दीकी ने भी मायावती पर टिकटों की खरीद-फरोख्त के गंभीर आरोप लगाए और ऑडियो टेप जारी किए.
कांग्रेस का साथ और अब सपा की साइकिल
बसपा से रुखसती के बाद सिद्दीकी 2018 में कांग्रेस में शामिल हुए. हालांकि वहां उन्हें वह वर्क स्टाइल नहीं मिला जिसके लिए वह जाने जाते थे. अब अखिलेश यादव के साथ आने के उनके फैसले के पीछे कई बड़े राजनीतिक मायने हैं.सपा ज्वाइन करते समय नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा 'भले ही मैं दूसरी पार्टी में था. लेकिन जब भी नेताजी (मुलायम सिंह यादव) से मिला तो लगा कि असली नेता वही हैं.'
अखिलेश के लिए सिद्दीकी क्यों जरूरी हैं?
मुस्लिम वोट बैंक: सिद्दीकी को पश्चिमी यूपी से लेकर बुंदेलखंड तक मुस्लिम समाज का बड़ा चेहरा माना जाता है.
बांदा और आसपास के जिलों में उनका मजबूत जमीनी आधार है. तीन दशक तक संगठन चलाने का उनका अनुभव सपा के 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को मजबूती दे सकता है.
क्या 2027 की बाजी पलट पाएगी यह जोड़ी?
अखिलेश यादव अब केवल अपने पुराने कैडर पर निर्भर नहीं हैं बल्कि वह बसपा और कांग्रेस के उन पुराने दिग्गजों को जोड़ रहे हैं जिनके पास 'ग्राउंड कनेक्ट' है. नसीमुद्दीन सिद्दीकी, अनीस अहमद और पूर्वांचल के अन्य नेताओं का सपा में आना यह संकेत देता है कि अखिलेश सोशल इंजीनियरिंग के जरिए बीजेपी को घेरने की तैयारी कर चुके हैं. अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या मायावती का पूर्व 'सिपहसालार' अखिलेश यादव को 2027 में सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा पाएगा.
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