उत्तर प्रदेश विधानसभा के बजट सत्र में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती पर दिए गए बयान ने एक नया सियासी संग्राम छेड़ दिया है. इस विवाद में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने एंट्री मारी है और इसे 'ब्राह्मण अस्मिता' से जोड़ते हुए एक बड़ा राजनीतिक दांव चला है. आपको बता दें कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सदन में कहा था कि हर व्यक्ति शंकराचार्य नहीं लिख सकता और किसी भी पीठ के आचार्य को मर्यादाओं का पालन करना होगा. उन्होंने संकेत दिया कि कुछ लोग वातावरण खराब करने का प्रयास कर रहे हैं.
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अखिलेश यादव का 'ब्राह्मण कार्ड'
इसके बाद अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर एक लंबी पोस्ट लिखकर सीएम योगी के बयान को परम पूज्य शंकराचार्य जी का घोर अपमानजनक अपशब्द करार दिया. उन्होंने इसे शाब्दिक हिंसा और पाप बताया. अखिलेश यादव ने इस विवाद को ब्राह्मण समाज के अपमान से जोड़ा. उन्होंने हरिशंकर तिवारी के 'हाता' की घटना और 'घूसखोर पंडित' फिल्म विवाद का जिक्र करते हुए दावा किया कि बीजेपी सरकार में ब्राह्मणों का लगातार अपमान हो रहा है.
आपको बता दें कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में (उमाशंकर पांडे के रूप में) हुआ था. अखिलेश ने इसी बिंदु को पकड़कर ब्राह्मणों को एक बड़ा संदेश देने की कोशिश की है. अखिलेश ने कहा कि जब इंसान नहीं, अहंकार बोलता है, तो वह संस्कार को विकार में बदल देता है. उन्होंने उन विधायकों पर भी निशाना साधा जिन्होंने सीएम योगी के बयान पर सदन में मेजें थपथपाईं. उन्होंने सरकार पर महाकुंभ की मौतों के आंकड़े छिपाने और मुआवजे में भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए. अखिलेश ने कहा कि समाज का एक-एक वोट इस अपमान का बदला लेगा और प्रदेश में नई सरकार बनाएगा.
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने भी सीएम योगी के बयान पर पलटवार करते हुए पूछा कि मुख्यमंत्री को यह अधिकार कहां से मिला कि वह तय करें कि कौन शंकराचार्य है और कौन नहीं? उन्होंने इस पद को चुनावी या नियुक्ति का पद नहीं बताया.
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