उत्तर प्रदेश की राजनीति में बाराबंकी की रामनगर विधानसभा सीट अपनी एक अलग और दिलचस्प पहचान रखती है. यहाँ की मिट्टी का मिजाज कुछ ऐसा है कि यहाँ की जनता हर बार नए चेहरे पर भरोसा जताती है. 2022 के विधानसभा चुनाव में इस सीट ने प्रदेशभर का ध्यान तब खींचा, जब यहाँ जीत-हार का अंतर बेहद मामूली रहा. अब 2027 की आहट के बीच एक बार फिर सियासी गलियारों में रामनगर की चर्चा तेज हो गई है.
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2022 का वो कांटे का मुकाबला
पिछले चुनाव में समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता फरीद महफूज किदवई ने यहाँ जीत का परचम लहराया था, लेकिन यह जीत किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी. उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी को महज 261 वोटों के बेहद बारीक अंतर से शिकस्त दी थी. इतने कम अंतर ने यह साफ कर दिया था कि यहाँ मुकाबला किसी भी तरफ झुक सकता है.
यहाँ का 'अनोखा' रिवाज: कोई नहीं जीतता दोबारा
रामनगर सीट का इतिहास रहा है कि यहाँ की जनता लगातार दूसरी बार किसी को मौका नहीं देती. पिछले कुछ दशकों में सपा, भाजपा और बसपा, तीनों ही दलों के प्रत्याशी यहाँ से अपनी बारी-बारी से किस्मत आजमा चुके हैं. यह 'बदलाव' की परंपरा 2027 के चुनाव में मौजूदा विधायक और विपक्षी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित होने वाली है.
जातिगत समीकरण: 'सोशल इंजीनियरिंग' की असली जमीन
इस सीट पर जीत का रास्ता जातिगत समीकरणों की पेचीदा गलियों से होकर गुजरता है. यहाँ मुस्लिम, ब्राह्मण, यादव, पासी और कुर्मी मतदाताओं की अच्छी-खासी तादाद है.
- सपा का गणित: जब मुस्लिम-यादव-पासी (MYP) समीकरण एक साथ आता है, तो साइकिल की रफ्तार तेज हो जाती है.
- भाजपा की रणनीति: भाजपा यहाँ दलित और ओबीसी वोटों में सेंधमारी कर सपा के मजबूत किलों को ढहाने की कोशिश में रहती है.
विपक्षी विधायक की चुनौतियां और विकास
विपक्षी दल का विधायक होने के नाते फरीद किदवई के सामने संसाधनों और विधायक निधि की अपनी सीमाएं रहीं, फिर भी स्थानीय स्तर पर मंदिर, मस्जिद, मदरसा और स्कूलों में बिजली की आपूर्ति जैसे कार्यों के दावे किए जाते हैं. क्षेत्र में पानी की समस्या के समाधान को लेकर भी कुछ राहत मिली है, लेकिन जनता की अपेक्षाएं अब भी कहीं ज्यादा हैं.
2027 की बिसात: क्या दोहराएगा इतिहास?
2027 के महासंग्राम को लेकर अभी से कयासों का दौर शुरू है. भाजपा पिछली बार की मामूली हार को एक बड़े बहुमत में बदलने के लिए रणनीतियां तैयार कर रही है. वहीं, समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह है कि क्या वह अपने मौजूदा विधायक पर फिर से दांव लगाएगी या किसी नए चेहरे के साथ मैदान में उतरेगी. स्थानीय पत्रकारों और सियासी जानकारों की मानें तो इस बार का मुकाबला पहले से भी अधिक दिलचस्प और नजदीकी होने की उम्मीद है.
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