Sambhal विधानसभा चुनाव 2027: 2024 की हिंसा के बाद बदला सियासी मिजाज, क्या सपा बचा पाएगी अपना 'अभेद्य किला' या खिलेगा कमल?

संभल में 2024 की हिंसा के बाद 2027 विधानसभा चुनाव की चर्चाएं तेज हैं. क्षेत्र में सपा का कब्जा मजबूत है लेकिन बीजेपी भी दावेदारी कर रही है. जातीय समीकरण, विकास और जनता की समस्याएं चुनाव पर असर डालेंगी.

यूपी तक

• 07:54 PM • 07 Jun 2026

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संभल: उत्तर प्रदेश की राजनीति में संभल विधानसभा सीट हमेशा से सुर्खियों में रही है, लेकिन 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा के बाद अब 'संभल विधानसभा चुनाव 2027' राजनीतिक और धार्मिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा मथुरा और काशी के साथ-साथ संभल का नाम बार-बार लिए जाने के बाद इस क्षेत्र पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं. योगी सरकार ने यहां मंदिरों के विकास, तीर्थस्थलों के जीर्णोद्धार, परिक्रमा मार्ग के निर्माण और हिंसा प्रभावितों के पुनर्स्थापन के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं, जिसे भाजपा विकास के बड़े मॉडल के रूप में प्रचारित कर रही है.

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सपा का अभेद्य किला: पिछले 6 चुनावों से लगातार मिल रही है जीत

धार्मिक ध्रुवीकरण और नए सियासी समीकरणों के बीच संभल सीट का पुराना इतिहास समाजवादी पार्टी (सपा) के पक्ष में रहा है:

सपा का वर्चस्व: यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र समाजवादी पार्टी के लिए प्रदेश की सबसे सुरक्षित सीटों में से एक माना जाता है. पिछले छह विधानसभा चुनावों से यहां लगातार सपा का ही परचम लहरा रहा है.

वर्तमान स्थिति: वर्तमान में नवाब इकबाल महमूद यहां से विधायक हैं. हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने हर चुनाव में यहां कड़ी टक्कर दी है, लेकिन वे अब तक इस किले को ढहाने में कामयाब नहीं हो पाई हैं.

बीजेपी की 'हिंदुत्व नीति' बनाम सपा का 'पारंपरिक कनेक्शन'

2027 के चुनाव में संभल का जातीय और सामाजिक गणित बेहद दिलचस्प होने वाला है. इस क्षेत्र में सैनी, वैश्य, ब्राह्मण और मुस्लिम समुदाय की आबादी प्रमुख है, जिनका वोट प्रतिशत ही जीत-हार की असल इबारत लिखता है.

इस बार सीधा मुकाबला भारतीय जनता पार्टी की प्रखर 'हिंदुत्व नीति' और योजनाबद्ध धार्मिक विकास बनाम समाजवादी पार्टी के पारंपरिक व मजबूत जमीनी कनेक्शन के बीच देखने को मिलेगा.

धार्मिक ध्रुवीकरण के बीच महंगाई, बेरोजगारी और बिजली भी बड़ा मुद्दा

2024 की हिंसा के बाद भले ही सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक तनाव चरम पर है, लेकिन स्थानीय जनता के बीच बुनियादी मुद्दे भी अपनी जगह बनाए हुए हैं:

जहां एक तरफ योगी सरकार के विकास कार्यों से समाज के विभिन्न वर्गों को लाभ पहुंचने की उम्मीद है.

वहीं दूसरी तरफ स्थानीय जनता महंगाई, बेरोजगारी और बिजली की किल्लत जैसी रोजमर्रा की समस्याओं से भी बेहद चिंतित है. ये जमीनी मुद्दे चुनाव परिणामों को बड़ा उलटफेर करने की ताकत रखते हैं.