देश आजादी का अमृत काल मना रहा है तथा यह साल ऐतिहासिक काकोरी एक्शन (9 अगस्त 1925) की 100वीं वर्षगांठ का प्रतीक भी है.
ऐसे में औपनिवेशिक मानसिकता के अवशेषों और राजनीतिक परिवारवाद के प्रतीकों को हटाकर देश के अमर बलिदानियों को उनका वास्तविक सम्मान देना हर भारतीय का परम राष्ट्रीय कर्तव्य है. अगर आप प्रयागराज में हैं या कभी वहां जाएं तो आपको ठाकुर रोशन सिंह के बलिदान को जरूर जानना होगा.
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शाहजहांपुर की जमीन पर जन्में ठाकुर रोशन सिंह भारत मां के उन निर्भीक और महान क्रांतिकारियों में से एक थे, जिन्होंने पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल', अशफाक उल्ला खां और सचिन्द्र नाथ बख्शी के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी.
ठाकुर रोशन सिंह का शौर्य, देशभक्ति और बलिदान उसी उच्च श्रेणी का था जिस श्रेणी में सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और राम प्रसाद 'बिस्मिल' जैसे मां भारती के अनेक अमर सपूत आते हैं, जिन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते प्राण न्योछावर कर सर्वोच्च बलिदान दिया.
ठाकुर रोशन सिंह को काकोरी कांड के मुकदमे में अंग्रेजों ने मृत्युदंड की सजा सुनाई थी. 19 दिसंबर 1927 की सुबह, हाथ में गीता लेकर, चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान के साथ वंदे मातरम और भारत माता की जय का उद्घोष करते हुए वे फंदे पर झूल गए थे.
आज प्रयागराज में जिस स्थान पर स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल स्थित है, अंग्रेजी हुकूमत में वहीं प्रयागराज की ऐतिहासिक साउथ मालाका जेल हुआ करती थी. ठाकुर रोशन सिंह ने जीवन के अंतिम 8 महीने इसी जेल की कालकोठरी में असह्य यातनाएं सहते हुए बिताए थे और यहीं उन्हें फांसी दी गई थी.
स्वतंत्रता के बाद 1950 में प्रयागराज की मलाका जेल को नैनी स्थानांतरित कर दिया गया और उस भूमि को बाद में अस्पताल निर्माण के लिए दे दिया गया. जिस पावन माटी पर देश के अमर बलिदानी के प्राण न्यौछावर हुए, उस परिसर में उनकी स्मृति को केवल एक कोने की पुरानी बैरक और एक उपेक्षित प्रतिमा तक सीमित कर दिया गया, जबकि मुख्य अस्पताल का नाम मोती लाल नेहरू की पत्नी, स्वरूपारानी नेहरू के नाम पर रखा गया.
स्वरूप रानी नेहरू, पंडित मोतीलाल नेहरू की पत्नी और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी की माता जी थीं. उनका मुख्य परिचय देश के एक विशिष्ट और प्रभावशाली राजनीतिक घराने के केंद्र बिंदु के रूप में ही रहा है. ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार स्वरूप रानी नेहरू का जीवन मुख्यतः नेहरू परिवार के घरेलू एवं व्यक्तिगत दायरे तक या स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीकात्मक संघर्ष तक केंद्रित रहा.
जहां अमर क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह ने फांसी का फंदा चूमा उस जगह बने अस्पताल का नाम स्वरूपरानी पर होना भारतीय समाज के लिए शर्मनाक और बलिदानियों के संघर्ष पर धब्बा है. प्रयागराज में पहले से ही आनंद भवन, स्वराज भवन, कमला नेहरू अस्पताल, कमला नेहरू पार्क, नेहरू कॉम्प्लेक्स, इंदिरा भवन, मोती लाल नेहरू प्रौद्योगिकी संस्थान, जवाहरलाल नेहरू रोड जैसे दर्जनों प्रमुख स्थान व संस्थान, चौक चौराहे इसी नेहरू परिवार के नाम पर मौजूद हैं.
ऐसे में शहर के मुख्य अस्पताल का नाम भी उसी परिवार के नाम पर रखा जाना अन्य ठाकुर रोशन सिंह समेत उन तमाम क्रांतिकारियों गुमनाम बलिदानियों के साथ अन्याय है जिन्होंने सर्वोच्च बलिदान दिया. आजादी के बाद दशकों तक सत्ता में रहे एक दल ने देश के वास्तविक क्रांतिकारियों और शहीदों के इतिहास को दरकिनार कर केवल एक ही परिवार के इर्द-गिर्द संस्थाओं का नामकरण किया. काकोरी एक्शन की 100वीं वर्षगांठ इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का उपयुक्त समय है.
जिस भूमि पर शहीद रोशन सिंह ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी, उस पूरे चिकित्सा संस्थान का नाम तत्काल प्रभाव से अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह अस्पताल घोषित किया जाना चाहिए. ताकि पीढ़ियाँ क्रांतिकारियों के संघर्ष से परिचित हों और उन्हें पता चले कि देश की आजादी के लिए पुरखों ने क्या कीमत चुकाई. 8 अगस्त को राहुल गांधी प्रयागराज के दौरे पर आ रहे हैं. उचित होगा कि देश के स्वाधीनता सेनानियों का सम्मान करने के लिए वह स्वयं अस्पताल का नाम अमर शहीद ठाकुर रोशन सिंह के नाम पर करने के विचार का समर्थन करें.
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