Meja Assembly Seat: उत्तर प्रदेश के प्रयागराज जिले की मेजा विधानसभा सीट अपनी बदलती सियासत के लिए मशहूर है. इस सीट का इतिहास रहा है कि यहां की जनता हर चुनाव में नए चेहरे और नई पार्टी को मौका देती है. कभी यहां से भारतीय जनता पार्टी (BJP) जीतती है, तो कभी समाजवादी पार्टी (SP) या बहुजन समाज पार्टी (BSP) का कब्जा होता है. वर्तमान में इस सीट से समाजवादी पार्टी के संदीप पटेल विधायक हैं. 2022 के चुनाव में उन्होंने बीजेपी की मजबूत पकड़ को तोड़ते हुए जीत हासिल की थी.
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मेजा सीट का चुनावी इतिहास
मेजा विधानसभा सीट का इतिहास काफी दिलचस्प रहा है. साल 2002 में यहां से सीपीआई (CPI-M) के रामकृपाल ने जीत दर्ज की थी. इसके बाद 2007 में यह सीट बसपा के राजा बली जैसल के खाते में गई. 2012 में सपा के गिरीश चंद्र विधायक चुने गए. 2017 की बात करें तो मोदी लहर में इस सीट पर बीजेपी ने कब्जा जमाया और नीलम करवरिया विधायक बनीं. हालांकि, 2022 में सपा के संदीप पटेल ने जीत हासिल कर सीट पर फिर से सपा का परचम लहराया था. ब्राह्मण बाहुल्य होने के कारण इस सीट पर करवरिया परिवार का खासा दबदबा माना जाता है. अब मौजूदा विधायक संदीप पटेल का दावा है कि महंगाई, बेरोजगारी और पीडीए (PDA) फैक्टर के चलते जनता 2027 में भी सपा को ही चुनेगी.
क्या कहते हैं जातीय समीकरण?
मेजा सीट के जातीय समीकरणों की बात करें तो यह ब्राह्मण बाहुल्य सीट मानी जाती है. यहां करीब 1,20,000 ब्राह्मण वोटर हैं. इसके अलावा 75,000 दलित, 45,000 यादव, 40,000 निषाद, 35,000 मुस्लिम, 15,000 कुशवाहा और लगभग 10,000 कुर्मी मतदाता हैं. 2022 के चुनाव में दलित और ब्राह्मण वोटों का बंटवारा हुआ था, जिसका सीधा फायदा सपा के संदीप पटेल को मिला. वहीं, पिछले चुनाव में बसपा से टिकट पाने वाले बाबा तिवारी, जो ब्राह्मण समुदाय से आते हैं, इस बार खुद को मजबूत दावेदार मान रहे हैं. उनका कहना है कि जिस पार्टी को मेजा सीट जीतनी होगी, वह उन्हें ही टिकट देगी.
पत्रकारों की राय: कांटे की टक्कर
स्थानीय पत्रकारों का मानना है कि 2027 का चुनाव मेजा में बेहद कांटे की टक्कर वाला होगा. पत्रकारों के मुताबिक, 2022 में सपा की जीत के पीछे रेवती रमण सिंह का प्रभाव और जातीय समीकरण मुख्य कारण थे. लेकिन 2027 में क्या होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है. बीजेपी नेता उदयभान करवरिया अब जेल से बाहर आ चुके हैं और इलाके में उनका अच्छा-खासा प्रभाव है. अगर बीजेपी करवरिया परिवार के किसी सदस्य को मैदान में उतारती है, तो मुकाबला काफी रोचक हो जाएगा. पत्रकारों का यह भी कहना है कि इस सीट पर शहरी क्षेत्र की तरह 'ईमानदार और मिलनसार' छवि से ज्यादा 'दमदार' छवि वाले प्रत्याशी की जरूरत होती है. कुल मिलाकर, 2027 में जीत उसी की होगी जो अपने जातीय समीकरणों को सबसे बेहतर तरीके से साध पाएगी.
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