Mood kya hai Meerut: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का केंद्र माने जाने वाले मेरठ जिले में सियासी सरगर्मी तेज हो गई है. यूपी Tak की टीम ने मेरठ की सभी सातों विधानसभा सीटों के जमीनी हालात, वर्तमान समीकरणों और चुनावी भविष्य को टटोलने के लिए शहर के वरिष्ठ पत्रकारों के साथ एक विशेष चर्चा की है. इस चर्चा में सीटों के मौजूदा गणित, जातीय समीकरणों, और संभावित राजनीतिक उलटफेर पर विस्तार से बात की गई है.
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मेरठ की 7 विधानसभा सीटों का मौजूदा सियासी हाल
मेरठ जिले में कुल सात विधानसभा सीटें हैं, जिन पर वर्तमान में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और विपक्षी समाजवादी पार्टी (SP) के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है.
सपा के पास: किठौर (शाहिद मंजूर), सरधना (अतुल प्रधान), और मेरठ शहर (रफीक अंसारी)।
बीजेपी के पास: मेरठ कैंट (अमित अग्रवाल), हस्तिनापुर (दिनेश खटीक), और मेरठ दक्षिण (सोमेंद्र तोमर.
आरएलडी (गठबंधन) के पास: सिवालखास (गुलाम मोहम्मद - सपा-आरएलडी गठबंधन के तहत जीते थे, जो अब एनडीए का हिस्सा है).
पत्रकारों की राय और सीटों के समीकरण
चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकारों ने विभिन्न सीटों और वहां के स्थानीय मुद्दों पर अपने विचार रखे.
सरधना सीट: यह सीट हमेशा से हॉट रही है. पिछली बार अतुल प्रधान ने यहाँ से जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के बीजेपी के साथ जाने से यहां मुकाबला बेहद कड़ा और दिलचस्प हो गया है.
मेरठ शहर और किठौर: शहर सीट पर मुस्लिम बहुल आबादी और हालिया एसआईआर (SIR) के चलते मतदाता सूची में हुए बदलावों का असर चुनाव पर पड़ सकता है. वहीं किठौर में पूर्व मंत्री शाहिद मंजूर की स्थिति मजबूत मानी जा रही है हालांकि उन्हें अपनों से ही कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है.
दक्षिण और कैंट सीटें: मेरठ दक्षिण से मौजूदा विधायक व मंत्री सोमेंद्र तोमर के खिलाफ स्थानीय स्तर पर कुछ असंतोष और चर्चाएं हैं जिससे मुकाबला कठिन हो सकता है. वहीं कैंट सीट को बीजेपी का सबसे सुरक्षित और मजबूत गढ़ माना जाता है.
नए राजनीतिक दल और मुस्लिम मतदाताओं का रुख
चर्चा में इस बात पर भी मंथन हुआ कि ओवैसी की पार्टी (AIMIM) और आजाद समाज पार्टी (ASP) जैसे दल चुनावी मैदान में किस तरह असर डालेंगे. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति में यह दल वोटों का विभाजन करके अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को फायदा पहुंचा सकते हैं जबकि मुस्लिम मतदाता अपनी रणनीति को लेकर काफी जागरूक नजर आ रहे हैं.
आगामी चुनाव की दिशा और मुख्य मुद्दे
पत्रकारों का मानना है कि मेरठ का चुनाव हमेशा से जातिगत समीकरणों, ध्रुवीकरण और स्थानीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. हालांकि अभी प्रत्याशियों के नाम तय होना और दलों के बीच सीटों का तालमेल (गठबंधन) साफ होना बाकी है लेकिन इतना तय है कि 2027 का यह मुकाबला किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा और हर सीट पर कांटे की टक्कर देखने को मिलेगी.
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