कानपुर से सामने आई यह दर्दनाक घटना सिर्फ एक हादसा नहीं बल्कि दो परिवारों की पूरी दुनिया उजड़ने की कहानी बन गई है. गोविंद नगर के संयम विज (28) और बर्रा के सूरजभान सिंह (25), जो लखनऊ एक ही एनिमेशन स्टूडियो में काम करते थे और फिल्मों व विज्ञापनों की दुनिया को अपनी क्रिएटिविटी से रंग देते थे, लखनऊ की भीषण आग की घटना में अपनी जान गंवा बैठे. इस हादसे ने न सिर्फ उनके परिवारों को तोड़ दिया, बल्कि शहर की सुरक्षा व्यवस्था और आधुनिक इमारतों की सच्चाई पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
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एक साथ काम, एक साथ सपने और एक साथ दर्दनाक अंत
संयम विज और सूरजभान सिंह दोनों कानपुर के रहने वाले थे और लंबे समय से अच्छे दोस्त भी थे. दोनों एक ही एनिमेशन स्टूडियो में काम करते हुए अपने करियर को आगे बढ़ा रहे थे. लेकिन अचानक हुए इस हादसे ने दोनों की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म कर दी. खबर मिलते ही उनके घरों में मातम छा गया और परिजन तुरंत लखनऊ के लिए रवाना हो गए, जहां हादसा हुआ था.
परिवारों पर टूटा दुखों का पहाड़
संयम के परिवार पर यह दूसरा बड़ा सदमा था, क्योंकि कुछ ही दिन पहले उनकी दादी का निधन हुआ था और घर में 13वीं की तैयारी चल रही थी. परिवार को उम्मीद थी कि संयम इस मौके पर घर आएगा, लेकिन उनकी जगह उनकी मौत की खबर पहुंची. वहीं सूरजभान सिंह के परिवार में भी हालात बेहद दर्दनाक हैं, क्योंकि उनकी मां पहले ही अपने पति को खो चुकी थीं और अब बेटे के जाने से पूरी तरह टूट गई हैं. परिवार को अभी तक सूरजभान की मौत की पूरी जानकारी देने में भी कठिनाई आ रही है, क्योंकि सदमे की आशंका जताई जा रही है.
शॉर्ट सर्किट से लगी आग, बाहर निकलने का नहीं मिला मौका
जानकारी के अनुसार, ऑफिस में आग लगने की वजह एसी में हुआ शॉर्ट सर्किट बताया जा रहा है. आरोप है कि आग लगने के बाद कर्मचारी समय पर बाहर नहीं निकल पाए, जिससे दोनों युवकों की जान चली गई. परिजनों का कहना है कि बिल्डिंग में ऑटोमेटिक सेंसर और हाईटेक सिस्टम लगे होने के बावजूद इमरजेंसी गेट सही तरीके से काम नहीं कर सके, जिससे हादसा और भी गंभीर हो गया.
स्मार्ट बिल्डिंग या सिर्फ दिखावा?
इस हादसे ने एक बार फिर आधुनिक इमारतों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं. परिजनों और स्थानीय लोगों का कहना है कि कागजों पर भले ही फायर सेफ्टी एनओसी और निरीक्षण पास दिखाया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर अलग होती है. अगर इमरजेंसी में दरवाजे और सिस्टम काम नहीं करते तो करोड़ों की तकनीक सिर्फ दिखावा बनकर रह जाती है.
प्रशासन और सिस्टम पर गंभीर सवाल
इस घटना के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि फायर सेफ्टी ऑडिट और नियमों का पालन वास्तव में कितना प्रभावी है. यदि कर्मचारियों को सुरक्षित बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता, तो ऐसी व्यवस्थाओं का औचित्य क्या है? यह घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की गंभीर खामियों की ओर इशारा करती है.
दो परिवार, दो कुर्सियां और हमेशा के लिए खामोशी
आज संयम और सूरजभान के घरों में सन्नाटा है. उनकी कुर्सियां खाली हो चुकी हैं, मोबाइल फोन की घंटियां अब कभी नहीं बजेंगी और परिवार उनकी वापसी का इंतजार करते रह जाएंगे. यह हादसा सिर्फ दो युवाओं की मौत नहीं, बल्कि उन सभी सपनों का अंत है जो बेहतर भविष्य के लिए शहरों में कदम रखते हैं.
श्रद्धांजलि और एक बड़ा संदेश
इस दर्दनाक घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हमारी इमारतें और दफ्तर वास्तव में सुरक्षित हैं? अगर नहीं, तो ऐसे हादसों से बचने के लिए सख्त कदम उठाने की जरूरत है. संयम विज और सूरजभान सिंह को भावपूर्ण श्रद्धांजलि.
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