राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे मंदिर के भीतर स्टाफ की नियुक्तियों को लेकर बेहद चौंकाने वाले दावे सामने आ रहे हैं. यूपी Tak की एक्सक्लूसिव पड़ताल में भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा एक ऐसा बड़ा खुलासा हुआ है, जो सीधे तौर पर इस पूरे चंदा चोरी रैकेट की जड़ों की तरफ इशारा कर रहा है.
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मंदिर परिसर में हाउसकीपिंग का काम देखने वाली 'सैनिक सिक्योरिटी फर्म' के बड़े अधिकारियों ने यूपी Tak से खास बातचीत में दावा किया है कि मंदिर परिसर में तैनात स्टाफ के नाम सीधे ट्रस्ट से बैंक तक पहुंचे थे और फिर बैंक ने उन्हें एजेंसी के पेरोल पर रखने के लिए कहा गया था. इस खुलासे के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इन संदिग्ध नियुक्तियों के पीछे किसकी सिफारिश थी?
'स्टाफ हमारा, लेकिन लिस्ट मंदिर ट्रस्ट की थी'
चढ़ावा चोरी के इस पूरे मुद्दे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन कर्मचारियों को भर्ती किसने किया और ये किसके करीबी हैं? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए यूपी Tak ने सैनिक सिक्योरिटी फर्म के डायरेक्टर गौरव और एरिया मैनेजर जयराम से एक्सक्लूसिव बातचीत की. गौरतलब है कि जयराम वही शख्स हैं जो अयोध्या में लोगों की भर्ती प्रक्रिया के लिए ग्राउंड पर गए थे. इस मामले में एसआईटी (SIT) और अयोध्या पुलिस भी इन दोनों से विस्तार से पूछताछ कर चुकी है.
फर्म के अधिकारियों ने खुलासा करते हुए बताया कि मंदिर परिसर में जो हाउसकीपिंग स्टाफ काम करता है, उनकी भर्ती भले ही बैंक के जरिए कोई दूसरी एजेंसी (जैसे सैनिक सिक्योरिटी फर्म) करती है, लेकिन उन लोगों के नामों का चयन मंदिर ट्रस्ट के लोग ही करते हैं. यानी स्टाफ भले ही सिक्योरिटी एजेंसी का ऑन-पेपर दिखे, लेकिन हकीकत में उन कर्मियों के नामों की बकायदा एक लिस्ट मंदिर ट्रस्ट की तरफ से बैंक को और बैंक से एजेंसी के पास जाती है, जिसमें साफ निर्देश होता है कि 'इन्हें पेरोल पर रख लीजिए.' इसके बाद कंपनी केवल औपचारिकता पूरी करके उन्हें हायर कर लेती है और उनकी सैलरी शुरू हो जाती है.
'नवंबर 2024 में बुलाकर दी गई थी 15 आदमियों की लिस्ट'
सैनिक सिक्योरिटी फर्म के एरिया मैनेजर जयराम ने पुलिस और एसआईटी के सामने दिए अपने बयान और यूपी Tak से बातचीत में कहा,
"जब जांच अधिकारियों ने हमसे पूछा कि आपने इन लोगों को कैसे भर्ती किया, तो मैंने साफ बताया कि हम पैरलल कंपनियां हैं. मैं अयोध्या में काम कर रहा था और अयोध्या ब्रांच में मेरे पहले से चार आदमी लगे हुए थे. इसके बाद नवंबर 2024 में हमें बुलाकर 15 नए आदमियों का वर्क ऑर्डर थमा दिया गया. इसके साथ ही उन बंदों के नाम और पूरी लिस्ट भी मुझे दी गई कि इन्हीं बंदों को काम पर रखना है और पेमेंट देना है. इतना ही नहीं, इससे पहले जो चार लोग काम कर रहे थे, उनके नाम भी हमें बैंक ने ही मुहैया कराए थे."
जब जयराम से हाउसकीपिंग स्टाफ को हायर करने के सामान्य नियमों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि आमतौर पर वर्क ऑर्डर मिलने के बाद मैनपावर देना हमारा काम होता है. लेकिन यहां मामला अलग था. हमें सीधे कहा गया कि ये बंदे पहले से काम कर रहे हैं, इनको आप अपने पैनल पर रख लीजिए. सीधा सा मतलब है कि इसके पीछे किसी न किसी की बड़ी सिफारिश काम कर रही थी.
'अयोध्या का टेंडर बड़ा था, इसलिए हम मना नहीं कर पाए'
फर्म के डायरेक्टर गौरव ने इस कॉरपोरेट और प्रशासनिक गठजोड़ की कड़ियों को जोड़ते हुए बताया:
"हमारा स्टेट बैंक (SBI) के साथ हाउसकीपिंग स्टाफ के लिए कॉर्पोरेट लेवल पर अनुबंध है. मंदिर परिसर के भीतर हाउस कीपिंग का स्टाफ हमें स्टेट बैंक ने दिया हुआ है, जबकि सुरक्षा का जिम्मा एसआईएस (SIS) के पास है. जो स्टाफ सेलेक्ट हुआ था, उसकी लिस्ट मूल रूप से मंदिर ट्रस्ट से ही मिली थी कि 'ये हमारे आदमी हैं.' ट्रस्ट ने वह लिस्ट बैंक को सौंपी और बैंक ने हमारे पास फॉरवर्ड की कि आप इन्हें अपने पेरोल पर रख लीजिए."
गौरव ने आगे नियमों का हवाला देते हुए बताया कि उनकी फर्म का काम करीब 8 से 10 राज्यों में चल रहा है. अयोध्या को छोड़कर बाकी की सभी जगहों पर भर्ती करने का पूरा अधिकार और प्रक्रिया हमारी कंपनी खुद तय करती है. लेकिन अयोध्या के मामले में स्टेट बैंक ने खुद हमसे 18-19 आदमियों के लिए विशेष तौर पर कहा था कि इन्हें ही पेरोल पर रखना है. चूंकि राम मंदिर का टेंडर बेहद बड़ा और प्रतिष्ठित था, इसलिए व्यावसायिक मजबूरियों के कारण हम बैंक को मना नहीं कर सके.
अब सबसे बड़ा सवाल- बैंक का वो अधिकारी कौन था?
सैनिक सिक्योरिटी फर्म के इस बयान से यह पूरी तरह साफ हो गया है कि फर्म की भूमिका सिर्फ इतनी थी कि उन्हें ऊपर से नामों की तैयार लिस्ट मिली और उन्होंने उन लोगों को नौकरी पर रख लिया. हालांकि, जब यूपी Tak की टीम ने फर्म से उस लिखित वर्क ऑर्डर की कॉपी मांगी, तो वह हमें उपलब्ध नहीं कराई गई, जिससे फर्म की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े होते हैं.
लेकिन इस पूरी इनसाइड स्टोरी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट अब बैंक का वो अज्ञात अधिकारी है, जिसने नाम सहित वह लिस्ट सिक्योरिटी फर्म को सौंपी थी और इन संदिग्ध लोगों की भर्ती करने का दबाव बनाया था. एसआईटी और जांच एजेंसियों के लिए अब यह सबसे बड़ा सुराग है; यदि उस बैंक अधिकारी से कड़ाई से पूछताछ की जाए, तो राम मंदिर के इस पूरे चंदा चोरी रैकेट के मास्टरमाइंड का चेहरा पूरी तरह बेकाब हो सकता है.
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