उत्तर प्रदेश के आगरा में थर्ड डिग्री के आरोपों से घिरी आगरा पुलिस अब अपने भीतर झांकने और अपनी कार्यशैली को मानवीय बनाने की दिशा में ठोस कदम उठा रही है. किरावली थाने में पूछताछ के दौरान युवक के पैर टूटने और थाना छत्ता में सामने आए कथित अमानवीय व्यवहार ने पुलिस कमिश्नरेट की छवि पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. इस घटना ने पूरे सिस्टम को झकझोर दिया और पुलिस के व्यवहार में सुधार की आवश्यकता को और साफ कर दिया है. इस घटना के बाद आगरा पुलिस ने अब मानसिक स्वास्थ्य और संवेदनशील पुलिसिंग को बढ़ावा देने के लिए नई पहल शुरू की है. पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार के निर्देशन में बिहेवियर साइंटिस्ट और लाइफ कोच डॉ. नवीन गुप्ता की मदद से इस पहल की औपचारिक शुरुआत की गई है.
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पुलिसकर्मियों की मानसिक स्थिति पर होगा काम
बता ददन कि इस नई योजना के तहत आगरा कमिश्नरेट के सभी 49 थानों के पुलिसकर्मियों और अधिकारियों की मानसिक स्थिति और व्यवहार का आकलन किया जाएगा. इसमें यह देखा जाएगा कि कौनसा पुलिसकर्मी किस स्तर के मानसिक दबाव का सामन कर रहा है और उसका असर उसके व्यवहार पर कितना पड़ रहा है.
इस कार्यक्रम की शुरुआत आगरा स्थित प्रशांत मेमोरियल सभागार में आयोजित विशेष संवादात्मक कार्यशाला से हुई है. इस कार्यशाला का विषय था “कार्य निष्पादन हेतु मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन”, जिसमें कमिश्नरेट आगरा के सभी राजपत्रित अधिकारी शामिल हुए थे.
डॉ. नवीन गुप्ता का मार्गदर्शन
कार्यशाला में डॉ. नवीन गुप्ता ने अधिकारियों को समझाया कि अत्यधिक तनाव, मानसिक दबाव और भावनात्मक असंतुलन किसी भी व्यक्ति के व्यवहार को आक्रामक बना सकते हैं. उन्होंने बताया कि पुलिसकर्मी लगातार ड्यूटी, अपराध का दबाव, पीड़ितों की अपेक्षाएं, सिस्टम की मजबूरियां और निजी जीवन की परेशानियों का सामना करते हैं. अगर इन दबावों का समय पर प्रबंधन नहीं किया गया तो यह तनाव थर्ड डिग्री, कठोरता और असंवेदनशील व्यवहार में बदल सकता है.
डॉ. गुप्ता ने यह भी बताया कि नेतृत्व का मानसिक संतुलन पूरे थाने के माहौल को प्रभावित करता है. अगर वरिष्ठ अधिकारी तनाव में रहेंगे तो यह तनाव अधीनस्थों तक जाएगा और आम जनता पर भी प्रतिकूल असर डालेगा.
मानसिक प्राथमिक सहायता और व्यवहारिक प्रशिक्षण
कार्यशाला में पुलिस अधिकारियों को साइकोलॉजिकल फर्स्ट ऐड यानी मानसिक प्राथमिक सहायता के बारे में प्रशिक्षण भी दिया गया. इसमें बताया गया कि अत्यधिक तनाव, गुस्से या मानसिक अस्थिरता में व्यक्ति से कैसे बात करें, कैसे सुनें और स्थिति को शांत कैसे करें. आगरा पुलिस अब उन कर्मियों की पहचान करने जा रही है, जिनके व्यवहार में लगातार आक्रामकता या असंतुलन दिखता है. ऐसे कर्मियों को सीधे मनोवैज्ञानिक परामर्श से जोड़ा जाएगा ताकि समय रहते स्थिति को संभाला जा सके और कोई बड़ी चूक न हो.
सभी 49 थानों में व्यवहारिक प्रशिक्षण
आगे की योजना के तहत आगरा के सभी 49 थानों के थाना प्रभारियों को अलग अलग बैच में लगभग तीन घंटे की बिहेवियर ट्रेनिंग दी जाएगी. इस प्रशिक्षण में अधिकारियों को यह सिखाया जाएगा कि पीड़ितों से कैसे बात करनी चाहिए, भाषा शैली कैसी होनी चाहिए, तनाव में आए व्यक्ति को कैसे संभालना है और कानून लागू करते समय इंसानियत कैसे बनाए रखी जाए.
डॉ. नवीन गुप्ता के अनुसार, वरिष्ठ अधिकारियों ने इस कार्यशाला को गंभीरता से लिया और सभी मनोवैज्ञानिक सुझाव नोटबुक में दर्ज किए. बहुत जल्द यह अभियान थाना स्तर पर ज़मीन पर उतरेगा और पुलिसिंग में संवेदनशीलता को बढ़ावा देग.
सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन
थर्ड डिग्री की घटनाओं से मिली किरकिरी के बाद आगरा पुलिस अब सिर्फ कार्रवाई तक सीमित नहीं रहना चाहती. बल्कि अपनी सोच, व्यवहार और पूरे सिस्टम को सुधारने की दिशा में भी कदम उठा रही है. बिहेवियर साइंटिस्ट से संवाद, मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी और संवेदनशील पुलिसिंग की यह पहल इस बात का संकेत है कि आगरा पुलिस अब सख्ती के साथ साथ संवेदनशीलता को भी अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रही है.
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