उत्तर प्रदेश का आगामी 2027 का विधानसभा चुनाव पूरे देश के लिए सबसे दिलचस्प और बड़ा सियासी अखाड़ा बनने जा रहा है. पश्चिम बंगाल के हालिया और चौंकाने वाले चुनावी नतीजों के बाद अब सबकी निगाहें देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश पर टिक गई हैं. सवाल बड़ा है कि क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपनी सत्ता को बरकरार रखते हुए हैट्रिक लगाएंगे या फिर 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे के साथ लगातार हुंकार भर रहे अखिलेश यादव बीजेपी के विजय रथ को रोककर सत्ता में वापसी करेंगे? वहीं हाशिए पर चल रही मायावती की बहुजन समाज पार्टी की ताकत को लेकर भी कई कयास लगाए जा रहे हैं. इन तमाम कड़वे और सीधे सवालों के बीच देश के सबसे सटीक एग्जिट पोल के लिए मशहूर 'एक्सिस माय इंडिया' के फाउंडर प्रदीप गुप्ता ने उत्तर प्रदेश की मौजूदा जमीनी हकीकत और जनता के मूड को लेकर एक बेहद चौंकाने वाली भविष्यवाणी की है जिसने सभी राजनीतिक दलों की धड़कनें बढ़ा दी हैं.
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योगी सरकार के कामकाज से लोग संतुष्ट, लेकिन...
पीटीआई (PTI) को दिए एक विशेष इंटरव्यू में चुनावी विश्लेषक प्रदीप गुप्ता ने उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे आगामी चुनावी राज्यों को लेकर अपनी कंपनी की शुरुआती एनालिसिस साझा की. प्रदीप गुप्ता ने साफ किया कि उनकी टीम चुनावी राज्यों में करीब एक साल पहले से ही जनता का मूड और सेंटिमेंट्स टटोलने में जुट जाती है.
मौजूदा स्थिति में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार को लेकर उन्होंने कहा कि 'अगर उत्तर प्रदेश में 'फीडबैक इन टोटैलिटी' (कुल मिलाकर मिलने वाले फीडबैक) की बात करें तो सरकार के कामकाज से जनता का 'सैटिस्फेक्शन कोशेंट' (संतुष्टि का स्तर) अच्छा है. इस हिसाब से आज की तारीख में यूपी में सत्ताधारी दल के लिए उतनी बड़ी दिक्कत नजर नहीं आ रही है.'
उत्तर प्रदेश की सियासत का वो 'बड़ा इशारा' जो बदल सकता है बाजी
हालांकि योगी सरकार के काम से संतोष जताने के साथ ही प्रदीप गुप्ता ने एक बड़ा अलर्ट भी जारी किया. उन्होंने उत्तर प्रदेश की राजनीतिक प्रकृति को समझाते हुए कहा कि यूपी बेहद अलग और अप्रत्याशित राज्य है जहां पल-पल में समीकरण बदलते हैं. प्रदीप गुप्ता ने उत्तर प्रदेश की सियासत के दो सबसे बड़े नियम बताए
जाति बनाम परफॉर्मेंस: यूपी में जातिवाद (Castism) हमेशा रहेगा, उसे राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता. लेकिन जनता वोटिंग के वक्त सरकार की 'परफॉर्मेंस' यानी कामकाज को सबसे ऊपर रखती है.
विकल्प की तलाश: जनता का मूड बदलने में समय नहीं लगता. अगर किसी मोड़ पर जनता को लगता है कि मौजूदा सरकार का परफॉर्मेंस उतना ठीक नहीं है तो वो तुरंत यह देखती है कि दूसरा कौन सा बेहतर विकल्प उनके पास उपलब्ध है जो इससे बेहतर काम कर सके.
अखिलेश का 'PDA' और चारकोणीय मुकाबले का पुराना इतिहास
एक तरफ जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने हिंदुत्व की धार को लगातार मजबूत कर रहे हैं.वहीं दूसरी तरफ अखिलेश यादव 'PDA' के जरिए कश्यप, मौर्य, यादव और कुर्मी जैसे तमाम जातीय समीकरणों को एकजुट करने में जुटे हैं. चाहे लखनऊ में मोनू कश्यप की मां को आर्थिक सहायता देना हो या फिर 'वोट की चोट' का नारा, सपा हर दूसरे दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी धार मजबूत कर रही है.
प्रदीप गुप्ता ने यूपी के इतिहास और पंजाब के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य (जहां अब चार बड़ी पार्टियां आमने-सामने हैं) का उदाहरण देते हुए एक बड़ा गणित समझाया.उन्होंने कहा कि जब चुनाव बहुकोणीय (चार पार्टियों के बीच) होता है, तो पूरा खेल बदल जाता है। इतिहास गवाह है कि इसी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने बिना किसी गठबंधन के महज 26% वोट शेयर के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी. बहुजन समाज पार्टी (मायावती) ने सिर्फ 29% वोट शेयर पाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बना ली थी.
कुछ महीनों का खेल और अखिलेश के सामने बड़ी चुनौती
प्रदीप गुप्ता के इस सियासी विश्लेषण का सीधा इशारा यही है कि भले ही आज की तारीख में यूपी के 35% से 40% लोग योगी सरकार से खुश हों. लेकिन अगर आने वाले कुछ महीनों में जनता का मूड थोड़ा भी इधर-उधर बदला या वोट बंटे, तो 25% वोट पाने वाला विकल्प भी बाजी मार सकता है.
अब सबसे बड़ा सस्पेंस यही है कि क्या चुनाव धर्म के आधार पर होगा या जातियों के चक्रव्यूह पर? और क्या वाकई अखिलेश यादव का 'PDA' मॉडल जनता के सामने खुद को उस मजबूत और भरोसेमंद 'विकल्प' के रूप में स्थापित कर पाएगा, जैसा जनता ने उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में स्वीकार किया था? आने वाले कुछ महीने यूपी की राजनीति की अंतिम तस्वीर साफ करेंगे.
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