मथुरा के प्रसिद्ध 'फरसा वाले बाबा' (चंद्रशेखर बाबा) की दुखद मृत्यु के बाद उनके जीवन और उनके 'फरसा' उठाने के पीछे की कहानी चर्चा में है. महज 8 साल की उम्र में संन्यास लेने वाले बाबा का जीवन गौ सेवा और संघर्ष की एक अनूठी मिसाल रहा है. बाबा चंद्रशेखर मूल रूप से फिरोजाबाद जिले के 'गोपाल का नगला' गांव के रहने वाले थे. बचपन में ही उनके माता-पिता का साया सिर से उठ गया था. इस बड़े व्यक्तिगत दुख ने उन्हें वैराग्य की ओर धकेल दिया और मात्र 8 साल की उम्र में उन्होंने संन्यास ले लिया.
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अयोध्या से ब्रज तक का सफर
संन्यास के बाद उन्होंने लगभग 20 साल अयोध्या में बिताए. वे राम जन्मभूमि आंदोलन में भी सक्रिय रूप से शामिल रहे. अयोध्या से लौटने के बाद वे कान्हा की नगरी ब्रज (मथुरा) में बस गए और अपना पूरा जीवन गौ सेवा और गौ रक्षा के लिए समर्पित कर दिया.
'फरसा वाले बाबा' नाम कैसे पड़ा?
बाबा के समर्थकों के अनुसार, उन्होंने गौ तस्करों से निपटने और गायों की रक्षा के लिए हथियार के तौर पर फरसा उठाना शुरू किया था. वे लगभग 15 किलो का फरसा अपने साथ लेकर चलते थे. पिछले 30-40 वर्षों से वे लगातार फरसा लेकर चलते थे, जिसके कारण पूरे ब्रज क्षेत्र में उन्हें 'फरसा वाले बाबा' के नाम से पहचान मिली.
मृत्यु पर विवाद: साजिश या हादसा?
बाबा के साथ मौजूद सहयोगी 'हरि ओम' का आरोप है कि यह कोई हादसा नहीं बल्कि साजिश के तहत किया गया मर्डर है. उनका कहना है कि उस रात कोहरा इतना ज्यादा नहीं था कि एक्सीडेंट हो जाए. पुलिस के अनुसार, यह घटना घने कोहरे के कारण हुई. बाबा ने एक संदिग्ध कंटेनर को रोका था, तभी पीछे से आए एक ट्रक ने उन्हें टक्कर मार दी. कंटेनर की जांच में केवल किराने का सामान (परचून) मिला, गौ तस्करी का कोई सबूत नहीं मिला.
बाबा ने छाता ब्लॉक के आजनोख गांव में एक विशाल गौशाला बनाई थी, जहां सैकड़ों गायों की सेवा की जाती थी. उनकी मृत्यु के बाद प्रशासन ने आश्वासन दिया है कि इन गायों की देखरेख और चारे की जिम्मेदारी अब सरकार उठाएगी.
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