बीती 27 फरवरी को लोनी में सलीम वास्तविक पर उस वक्त हमला हुआ जब वे अपने ऑफिस में सो रहे थे. नकाबपोश बदमाशों ने उन पर चाकुओं से ताबड़तोड़ वार किए, जिनका मकसद केवल हत्या नहीं बल्कि 'सिर तन से जुदा' करना था. हमले की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सलीम को अगले छह दिनों तक कुछ भी याद नहीं रहा. हालांकि, अपनी जीवटता और गाजियाबाद पुलिस की त्वरित कार्रवाई की बदौलत वे आज पूरी तरह स्वस्थ हैं और समाज के बीच अपनी बात रख रहे हैं.
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'पड़ोसियों ने नहीं की मदद, पुलिस बनी फरिश्ता'
सलीम ने पुरानी यादों को साझा करते हुए बताया कि जब उन पर हमला हुआ, तो उन्होंने जान बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया. दुखद पहलू यह रहा कि चीख-पुकार सुनकर भी पड़ोस का कोई व्यक्ति मदद के लिए आगे नहीं आया. सलीम ने यूपी पुलिस और स्थानीय प्रशासन की खुले दिल से तारीफ करते हुए कहा कि पुलिस ने न केवल उन्हें समय पर अस्पताल पहुंचाया, बल्कि दोषियों को उनके अंजाम तक पहुँचाकर त्वरित न्याय सुनिश्चित किया. उनका मानना है कि कुछ मुट्ठी भर लोगों की गलत और जिहादी मानसिकता के कारण पूरी मुस्लिम कौम की छवि खराब हुई है.
'इंसानियत से जुड़ें, नफरत से नहीं'
सलीम वास्तविक का अब एकमात्र लक्ष्य मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ना है. वे कहते हैं, "मैं चाहता हूं कि मेरे मुस्लिम भाई पढ़ें-लिखें, अच्छी नौकरियां करें और समाज में सम्मान पाएं. कट्टरता और नफरत का रास्ता सिर्फ बर्बादी की ओर ले जाता है." खुद एक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखने वाले सलीम का कहना है कि वे किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ हैं जो इंसान को हैवान बना देती है. वे चाहते हैं कि समाज में भाईचारा बढ़े और लोग एक-दूसरे के धर्म का सम्मान करें.
बहादुरी और उम्मीद का नया पैगाम
इस दर्दनाक अनुभव ने सलीम को और अधिक निडर बना दिया है. उनका मानना है कि इंसान की असली पहचान उसके लिबास या मजहब से नहीं, बल्कि उसके कर्मों और सोच से होती है. वे समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनका संघर्ष उन तमाम लोगों के लिए एक मिसाल है जो नफरत की राजनीति के शिकार हो जाते हैं. सलीम की कहानी चीख-चीख कर कह रही है कि नफरत को सिर्फ मोहब्बत और सही शिक्षा से ही खत्म किया जा सकता है.
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