अयोध्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा घोटाले को लेकर मचे सियासी और प्रशासनिक घमासान के बीच अब इस मामले के मुख्य किरदारों में से एक रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव की पत्नी पूनम यादव मीडिया के सामने आई हैं. टिन्नू यादव पर मंदिर के चढ़ावे और प्रॉपर्टी को लेकर गंभीर आरोप लगे हैं. इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए उनकी पत्नी पूनम यादव ने भावुक होकर अपने पति का बचाव किया और इसे 'बड़े लोगों' द्वारा फंसाने की एक गहरी साजिश करार दिया है.
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'50 कमरे का घर, होटल और लग्जरी गाड़ियां सब निराधार झूठ'
पूनम यादव ने मीडिया के सामने अपने परिवार पर लग रहे अकूत संपत्ति के आरोपों का खंडन करते हुए कहा, "दावा किया जा रहा है कि मेरे पति के पास 50 कमरों का मकान है, हॉस्टल है, होटल है और लग्जरी गाड़ियां हैं. मैं साफ कर दूं कि ये सब बातें पूरी तरह से गलत और निराधार हैं. क्या किसी के पास इस बात का कोई ठोस सबूत है? यह सिर्फ मेरे पति को बदनाम करने की साजिश है. लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि हमारे घर से सोना लेकर टीम निकली है, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है. अगर हमारे पास से कुछ भी गया होता, तो क्या आज मैं इस तरह शांत बैठती? मैं तो चिल्लाती-रोती कि मेरा सब कुछ चला गया."
'2008 में खरीदा था मकान, मंदिर के फैसले से पहले ही बन गया था'
प्रॉपर्टी विवाद पर स्थिति स्पष्ट करते हुए पूनम यादव ने बताया कि उनका मकान कोई नया नहीं है. उन्होंने कहा, "जिस मकान को लेकर बातें बनाई जा रही हैं, वह जमीन और घर हमने साल 2008 में ही खरीद लिया था. राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से बहुत पहले, साल 2015 में वह मकान बनकर तैयार हो चुका था. हमारे पास जो कुछ भी है, वह पूरी तरह से पारदर्शी और साफ-सुथरा है. हमने कोई घोटाला या गलत काम नहीं किया है."
चंपत राय से नजदीकी और 32 साल के संघर्ष की कहानी
पूनम यादव ने अपने पति के अतीत और राम मंदिर आंदोलन से जुड़ाव को याद करते हुए बताया कि टिन्नू यादव साल 1992 से (लगभग 32-35 वर्षों से) रामलला की सेवा में लगे हैं. उन्होंने बताया कि जब त्रिलोकीनाथ जी अस्वस्थ हो गए थे, तब टिन्नू यादव की ईमानदारी और लगन को देखकर चंपत राय जी ने उन्हें दिल्ली में राम मंदिर मुकदमे की पैरवी और कागजी कामकाज की देखरेख में लगाया था. वे हफ्ते में दो-दो बार दिल्ली आते-जाते थे.
दिन-रात की मेहनत: मुकदमा फाइनल होने के बाद उन्हें राम जन्मभूमि परिसर की व्यवस्थाओं में लगाया गया. पूनम ने कहा, "जब कोरोना काल में मंदिर निर्माण को जल्द पूरा करने का दबाव था, तब वह दिन-रात वहीं रहते थे, घर भी नहीं आते थे. मजदूरों के लिए खुद खड़े होकर भोजन बनवाते थे. जब वे ₹800 और ₹1200 की तनख्वाह पर काम करते थे, तब से सेवा कर रहे हैं. अगर वे बेईमान होते, तो क्या ट्रस्ट उन्हें इतने सालों तक अपने पास रखता?"
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