उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए एक बड़ी और अहम खबर है. योगी सरकार ने सरकारी नौकरियों में भर्ती के लिए होने वाले चरित्र सत्यापन (करैक्टर सर्टिफिकेट) को लेकर नियमों में बड़ा बदलाव किया है. इस नए नियम के तहत, अगर कोई युवा किसी हिंसक प्रदर्शन या तोड़फोड़ में शामिल पाया जाता है, तो उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य माना जाएगा. सरकार के इस सख्त फैसले के बाद से प्रदेश की सियासत भी गरमा गई है और विपक्षी पार्टियों ने इसका कड़ा विरोध करना शुरू कर दिया है. विपक्ष का आरोप है कि सरकार छात्रों को डराने और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों को छीनने की कोशिश कर रही है.
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चरित्र सत्यापन के लिए नया नियम
उत्तर प्रदेश के नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम देवराज की तरफ से यह नया निर्देश जारी किया गया है. यह नया नियम सभी सरकारी विभागों, निगमों और स्थानीय निकायों की भर्तियों पर लागू होगा. निर्देश में यह भी साफ किया गया है कि सिर्फ एफआईआर दर्ज होने या जांच पेंडिंग रहने से ही कोई अभ्यर्थी तुरंत अयोग्य घोषित नहीं हो जाएगा. पुलिस को ऐसे मामलों में 30 दिन के अंदर अपनी जांच और सत्यापन रिपोर्ट सौंपनी होगी. हालांकि, यह नियम पहले से सरकारी नौकरी कर रहे कर्मचारियों पर लागू नहीं होगा.
हिंसक संगठन से जुड़ाव पर रोक
इस नए आदेश में एक और अहम बात कही गई है. जो लोग किसी ऐसे संगठन से जुड़े हैं, जो हिंसा के जरिए व्यवस्था या सरकार को बदलने की कोशिश करते हैं, उन्हें भी सरकारी नौकरी के योग्य नहीं माना जाएगा. अगर किसी व्यक्ति ने 21 साल की उम्र के बाद और पुलिस जांच के दिन से 3 साल के अंदर किसी भी ऐसी हिंसक गतिविधि में हिस्सा लिया है, तो यह माना जाएगा कि वह अभी भी ऐसी गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल है.
विपक्ष ने फैसले को बताया तानाशाही
सरकार के इस नए फैसले पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. विपक्षी नेताओं का कहना है कि सरकार डर गई है और नहीं चाहती कि छात्र-छात्राएं सरकार की गलत नीतियों के खिलाफ आवाज उठाएं. उनका तर्क है कि संविधान ने सभी को लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का अधिकार दिया है, लेकिन सरकार यह मैसेज देकर तानाशाही अपनाना चाहती है. विपक्ष का कहना है कि युवा सरकार की धमकियों से डरने वाले नहीं हैं और गलत नीतियों का विरोध आगे भी करते रहेंगे.
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