UP News: हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान प्राकृतिक खेती, गौ संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने को लेकर महत्वपूर्ण बातें सामने आईं. इसमें गाय आधारित कृषि मॉडल, किसानों की आय बढ़ाने और “विकसित भारत 2047” के लक्ष्य को लेकर विस्तृत विचार साझा किए गए. इस दौरान गौवंश संरक्षण योजना, जैविक खेती और आत्मनिर्भरता जैसे विषयों पर विशेष जोर दिया गया.
ADVERTISEMENT
गौवंश संरक्षण और परिवारों को सहयोग योजना
कार्यक्रम में बताया गया कि यदि कोई बछड़ा या “बाई हुई गाय” (अनुपयोगी/बछिया) किसी परिवार को दी जाती है, तो उस परिवार को उसकी देखभाल करनी होगी. इसके बदले सरकार द्वारा प्रति गाय लगभग 1500 रुपये प्रतिमाह चारे के लिए सहायता देने की बात कही गई. यह भी बताया गया कि लगभग 1 लाख गौवंश इस योजना के तहत विभिन्न परिवारों तक पहुंचाए गए हैं, जिससे न केवल गायों की देखभाल हो रही है बल्कि परिवारों को दूध भी मिल रहा है.
देसी गाय और कृषि में उपयोगिता
कार्यक्रम में देसी गाय के महत्व पर जोर देते हुए कहा गया कि देसी गाय का दूध अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है, भले ही उत्पादन कम हो. साथ ही यह भी बताया गया कि गाय का गोबर और गोमूत्र प्राकृतिक खेती में बेहद उपयोगी हैं, जो खेतों के लिए प्राकृतिक खाद और कीटनाशक का काम करते हैं.
प्राकृतिक खेती का मॉडल: गोबर, गोमूत्र और जीवामृत
प्राकृतिक खेती की प्रक्रिया को समझाते हुए बताया गया कि गोबर, गोमूत्र, दलहन, गुड़ और पानी को मिलाकर “जीवामृत” तैयार किया जाता है. इस मिश्रण का उपयोग बीज शोधन और खेतों में छिड़काव के लिए किया जाता है, जिससे खेती पूरी तरह रसायन-मुक्त हो सकती है. हालांकि शुरुआत में थोड़ी मेहनत लगती है, लेकिन इससे उत्पादन लागत कम होती है और मिट्टी की गुणवत्ता भी बेहतर होती है.
वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञों का योगदान
इस दौरान प्राकृतिक खेती के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों जैसे आचार्य देवव्रत और सुभाष पालेकर के योगदान का भी उल्लेख किया गया. बताया गया कि इन विशेषज्ञों ने गौ-आधारित और रसायन-मुक्त खेती को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और कई राज्यों में इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं.
“विकसित भारत 2047” और स्वस्थ समाज का लक्ष्य
कार्यक्रम में कहा गया कि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए जरूरी है कि समाज स्वस्थ हो और खेती रसायन-मुक्त हो. स्वस्थ भारत का आधार प्राकृतिक खेती और कम लागत वाली कृषि व्यवस्था को बताया गया. यह भी कहा गया कि जब किसान, व्यापारी, कारीगर और युवा सभी समृद्ध होंगे तभी देश और राज्य का वास्तविक विकास संभव है.
आत्मनिर्भरता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर जोर
कार्यक्रम में आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा पर भी जोर दिया गया. बताया गया कि आत्मनिर्भरता का मतलब बाहरी संसाधनों पर निर्भर न रहकर अपने संसाधनों और परंपरागत ज्ञान का उपयोग करना है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसानों की भूमिका को सबसे महत्वपूर्ण बताया गया.
ADVERTISEMENT









