'अब किसी पर भरोसा करना मुश्किल...', जब अखिलेश ने चंद्रशेखर से कही दिल की बात, पत्रकार ने सुनाया रोचक किस्सा

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले सपा प्रमुख अखिलेश यादव, आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद और रालोद नेता जयंत चौधरी के राजनीतिक रिश्तों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले गठबंधन अनुभवों और बदलते समीकरणों का असर आगामी चुनावी रणनीतियों पर साफ दिखाई दे सकता है.

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यूपी तक

07 Jun 2026 (अपडेटेड: 07 Jun 2026, 06:57 PM)

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UP Election 2027: उत्तर प्रदेश की राजनीति में गठबंधन और नेताओं के आपसी रिश्ते बहुत तेजी से बदलते हैं. लोकसभा चुनाव के बाद अब सबकी नजरें 2027 के विधानसभा चुनाव पर टिकी हैं. इस बीच, समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव, आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद और रालोद (RLD) के जयंत चौधरी के बीच के राजनीतिक समीकरणों को लेकर कई बड़ी बातें सामने आई हैं.

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वरिष्ठ पत्रकार आस मोहम्मद कैफ ने यूपी तक पर बातचीत के दौरान इन नेताओं के रिश्तों और भविष्य की राजनीति को लेकर कुछ जरूरी फैक्ट्स शेयर किए हैं. 

अखिलेश और चंद्रशेखर के बीच अविश्वास की वजह

अखिलेश यादव और चंद्रशेखर आजाद के बीच आज जो अविश्वास यानी भरोसे की कमी दिख रही है, उसकी सबसे बड़ी वजह जयंत चौधरी हैं. वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक, एक समय चंद्रशेखर ने अखिलेश को फोन किया था. उस दौरान अखिलेश यादव ने चंद्रशेखर से साफ कहा था कि वह उनका सम्मान तो करते हैं, लेकिन जयंत चौधरी वाले एपिसोड के बाद अब किसी पर भी भरोसा करना उनके लिए बहुत मुश्किल हो गया है.

क्या था जयंत चौधरी वाला पूरा मामला?

एक समय था जब जयंत चौधरी और चंद्रशेखर के रिश्ते बहुत अच्छे थे. खतौली उपचुनाव के दौरान अखिलेश, जयंत और चंद्रशेखर तीनों नेता एक साथ एक ही मंच पर नजर आए थे. अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को पूरा सपोर्ट दिया, उन्हें राज्यसभा भेजा और 2022 के विधानसभा चुनाव में भी खुलकर साथ देकर उनकी राजनीतिक ताकत बढ़ाई.

बाद में जयंत चौधरी पाला बदलकर भाजपा के साथ चले गए. इस वजह से अखिलेश यादव को गहरा धक्का लगा. उन्हें लगा कि उन्होंने जिस नेता को आगे बढ़ाया और ताकत दी, उसने समय आने पर साथ छोड़ दिया.

चंद्रशेखर को आगे बढ़ाने से क्यों हिचक रहे हैं अखिलेश?

जयंत चौधरी वाले एपिसोड के बाद अखिलेश यादव अब फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं. वह चंद्रशेखर आजाद को ज्यादा प्रमोट करने या उन्हें बड़ी ताकत देने से बच रहे हैं. 

अखिलेश को यह डर सता रहा है कि अगर उन्होंने चंद्रशेखर का साथ देकर उन्हें मजबूत किया और 2027 के चुनाव में चंद्रशेखर के 10-12 विधायक जीतकर आ गए, तो भविष्य में वह खुद अखिलेश यादव के लिए ही बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकते हैं.

यही वजह है कि समाजवादी पार्टी ने अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति बदल दी है. सपा अब वहां जाट राजनीति के बजाय गैर-जाट अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) को अपने पाले में लाने पर ज्यादा फोकस कर रही है.

'चंद्रशेखर के पास खोने को कुछ नहीं'

इस पूरे समीकरण के बीच चंद्रशेखर आजाद फिलहाल दो रास्तों पर विचार कर रहे हैं. पहला रास्ता यह कि वह अकेले दम पर चुनाव लड़कर अपनी जमीन मजबूत करें और दूसरा यह कि वह सपा के साथ मिलकर आगे बढ़ें. 

पत्रकार आस मोहम्मद कैफ के अनुसार, चंद्रशेखर के पास खोने के लिए कुछ खास नहीं है, इसलिए वह राजनीति में बहुत बेबाकी और खुलकर अपनी बात रख रहे हैं. इसके उलट, अखिलेश यादव यूपी के बड़े नेता हैं और उन्हें सत्ता की रेस में बने रहने के लिए हर कदम पर राजनीतिक नफा-नुकसान को बहुत बारीकी से तौलना पड़ रहा है.