यूपी के इस शहर का एक बार फिर बदलेगा नाम, व्यापारियों की बढ़ गई टेंशन! 30 साल में 5 बार हो चुका बदलाव

यूपी तक

• 04:42 PM • 30 Jul 2026

उत्तर प्रदेश में भदोही का नाम फिर से संत रविदास नगर करने की घोषणा के बाद राजनीतिक बहस के साथ कारोबार जगत में भी हलचल तेज हो गई है.

UP Tak

Photo Source - AI Generated

Google CTA

उत्तर प्रदेश के कालीन शहर भदोही का नाम एक बार फिर बदलने की सीएम योगी ने घोषणा कर दी है. अब जिले के सियासी और व्यापारिक गलियारों में हलचल तेज है. बनारस में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के 'समरसता संकल्प अभियान' के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भदोही का नाम बदलकर 'संत रविदास नगर' करने का प्रस्ताव रखा है.

यह भी पढ़ें...

दुनियाभर में कारपेट कैपिटल (Carpet Capital) के नाम से मशहूर भदोही के लिए नाम बदलने का खेल नया नहीं है. पिछले तीन दशकों में यह जिला कई बार अपने नाम की पहचान बदलने का दर्द झेल चुका है. 

एक तरफ जहां संत रविदास जी के सम्मान और सामाजिक समरसता की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय कालीन व्यापारी और निर्यातक इस फैसले से सहमे हुए हैं. व्यापारियों का साफ मानना है कि 'भदोही' सिर्फ एक शहर का नाम नहीं, बल्कि ग्लोबल मार्केट में एक स्थापित ब्रांड है. 

नाम बदलने का 30 साल पुराना इतिहास

  • 1994 (मुलायम सिंह सरकार): 30 जून 1994 को मुलायम सिंह यादव की सरकार ने वाराणसी से अलग करके भदोही नाम से नया जिला बनाया था.
  • 1997 (मायावती सरकार): बसपा सरकार ने इसका नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया.
  • 2000 (राम प्रकाश गुप्ता सरकार): भाजपा की अल्पकालिक सरकार ने बीच का रास्ता निकालते हुए इसे 'संत रविदास नगर भदोही' कर दिया.
  • 2014 (अखिलेश यादव सरकार): सपा सरकार ने एक बार फिर पुराना नाम यानी भदोही बहाल कर दिया.
  • 2026 (योगी सरकार): अब 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले दलितों को साधने की मुहिम के तहत इसे दोबारा संत रविदास नगर बनाने की तैयारी है.

अंतरराष्ट्रीय खरीदारों में भ्रम फैलने का डर

कालीन उद्योग के दिग्गजों ने इस फैसले पर अपनी चिंता खुलकर जताई है. ऑल इंडिया कारपेट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (AICMA) के अध्यक्ष उमेश कुमार गुप्ता का कहना है, 

उद्योग सरकार के फैसलों के साथ खड़ा है, लेकिन भदोही की पहचान दुनियाभर में कारपेट सिटी के रूप में है. अगर यह नाम बरकरार रहता है, तो यह सभी हितधारकों के लिए ज्यादा फायदेमंद होगा.

कारपेट एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के चेयरमैन कैप्टन मुकेश कुमार गोम्बर ने कहा, 

"हम संत रविदास जी का पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन भदोही हाथ से बने कालीन के बाजार में एक ग्लोबल ब्रांड बन चुका है. नाम बदलने से विदेशी खरीदारों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है, जिससे इस ब्रांड की चमक फीकी पड़ जाएगी."

AICMA के पूर्व महामंत्री और निर्यातक पीयूष बर्नवाल ने याद दिलाया कि जब पहले नाम बदला गया था, तब निर्यात पर बहुत बुरा असर पड़ा था. भदोही नाम वापस आने के बाद ही व्यापार पटरी पर लौटा था. उन्होंने कहा, 

"देश के 8 राज्यों के 25 जिलों में कालीन बनते हैं, लेकिन जीआई टैग विशेष रूप से भदोही कालीन से जुड़ा है. टाउन ऑफ एक्सपोर्ट एक्सीलेंस का दर्जा भी इसी नाम से मिला है. राजनीतिक दलों को इस इलाके को अपनी प्रयोगशाला नहीं बनाना चाहिए."

वहीं, कालीन निर्यातक मुशीर इकबाल ने आरोप लगाया कि यह कदम आगामी चुनावों में दलित वोट बैंक को लुभाने के लिए उठाया जा रहा है, जिससे स्थानीय व्यापार और निर्यात को भारी नुकसान पहुंचेगा.

फैसले के समर्थन में भी उठीं आवाजें

दूसरी ओर, फैसले के समर्थन में भी तर्क दिए जा रहे हैं. औराई सीट से बीजेपी विधायक दीनानाथ भास्कर ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा कि छुआछूत के खिलाफ लड़ने वाले संत रविदास जी के नाम पर जिले का नाम होना गर्व की बात है. समाज सेविका संगीता खन्ना ने भी इसे सामाजिक समानता की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया.