सुप्रीम कोर्ट में जजों के सामने फाइल के पन्ने उछालने और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करने के आरोप में चर्चा में आए इटावा के प्रबल प्रताप यादव को लेकर अब उसके परिवार की प्रतिक्रिया सामने आई है. सोशल मीडिया पर जहां प्रबल के व्यवहार को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं, वहीं उसकी मां कुंती देवी और परिवार ने दावा किया है कि प्रबल लंबे समय से आर्थिक तंगी, पारिवारिक परेशानियों और कानूनी लड़ाई से तनाव में था. परिवार का कहना है कि उसकी मानसिक स्थिति पर इन समस्याओं का गहरा असर पड़ा था.
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'बहुत परेशान था बेटा', मां ने बताई घर की हालत
प्रबल प्रताप यादव की मां कुंती देवी ने कहा कि उनका बेटा काफी समय से परेशान चल रहा था. उन्होंने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और परिवार लगातार मुश्किलों से गुजर रहा था. कुंती देवी ने कहा कि उनका हाल ही में हार्ट का ऑपरेशन हुआ था. इसके अलावा वह किडनी की बीमारी से भी जूझ रही हैं. इलाज में लगातार खर्च होने से परिवार की आर्थिक हालत और बिगड़ गई थी. उनके मुताबिक, प्रबल इन हालात को लेकर बेहद चिंतित रहता था. उन्होंने कहा कि बेटा पढ़ाई और करियर को लेकर संघर्ष कर रहा था, लेकिन आर्थिक परेशानियां उसका पीछा नहीं छोड़ रही थीं.
'अंतिम लड़ाई लड़ने दिल्ली जा रहा हूं'
परिवार के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की घटना से कुछ दिन पहले प्रबल अपनी मां से मिलने आगरा आया था. उसने घरवालों से कहा था कि वह "अंतिम लड़ाई लड़ने दिल्ली, सुप्रीम कोर्ट जा रहा हूं. वहां न्याय मिलेगा." परिवार का कहना है कि उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि उसके मन में क्या चल रहा है और दिल्ली जाकर वह ऐसा कदम उठा देगा.
ताऊ बोले- कभी किसी से ऊंची आवाज में बात नहीं की
प्रबल के ताऊ रविंद्र सिंह ने बताया कि परिवार को इस घटना की जानकारी सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद मिली. उन्होंने कहा कि प्रबल पढ़ाई में अच्छा था और स्वभाव से शांत रहता था. उनके मुताबिक, उसने कभी किसी से गाली-गलौज नहीं की. परिवार का मानना है कि आर्थिक तंगी और लगातार कानूनी लड़ाई ने उसे मानसिक रूप से परेशान कर दिया था. ताऊ के अनुसार, जिस कंपनी में वह काम करता था, वहां उसका कुछ पैसा भी फंस गया था और उसी विवाद को लेकर वह कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहा था.
पिता ने भी आर्थिक तंगी को बताया वजह
प्रबल के पिता सुरेंद्र सिंह यादव, जो पेशे से किसान हैं, ने भी कहा कि बेटा आर्थिक संकट से जूझ रहा था. उनके मुताबिक, वह साइबर फ्रॉड का भी शिकार हुआ था और शिकायत करने के बावजूद उसकी सुनवाई नहीं हुई. उन्होंने बताया कि इसी मामले को लेकर प्रबल ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था. लगातार सुनवाई न होने और आर्थिक दबाव की वजह से वह काफी तनाव में रहने लगा था.
बीएड के बाद नौकरी नहीं मिली, फिर लखनऊ चला गया
परिवार के अनुसार, बीएड करने के बाद प्रबल को नौकरी नहीं मिली. इसके बाद वह लखनऊ चला गया, जहां उसने लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी में दाखिला लिया. लखनऊ में वह किराए के मकान में रहता था. खर्च चलाने के लिए ट्यूशन पढ़ाता था और एक निजी कंपनी में भी नौकरी करता था. परिवार का कहना है कि आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसकी पढ़ाई में मामा भी आर्थिक मदद करते थे.
कंपनी से निकाले जाने के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई
इस मामले में एक दूसरा पक्ष भी सामने आया है. जांच में सामने आया कि प्रबल लखनऊ की एक सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट कंपनी में काम करता था. आरोप है कि उसने अपनी एक मुस्लिम महिला सहकर्मी को आपत्तिजनक ईमेल भेजे और अभद्र टिप्पणियां कीं. शिकायत मिलने के बाद कंपनी ने पहले उसे चेतावनी दी, लेकिन कथित तौर पर व्यवहार नहीं बदलने पर उसे नौकरी से हटा दिया गया. इसके बाद प्रबल ने कंपनी पर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की. पुलिस और निचली अदालत से राहत नहीं मिलने पर वह हाईकोर्ट पहुंचा और अंत में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की.
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था?
10 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ के सामने सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप यादव ने कथित तौर पर जजों को 'मिस्टर ज्यूडिशियल सर्वेंट' कहकर संबोधित किया. उसने अदालत को आदेश देने की कोशिश की, फिर फाइल के पन्ने हवा में उछाल दिए और सीजेआई के लिए आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया. सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उसे कोर्ट रूम से बाहर कर दिया. बाद में अदालत ने उसकी मानसिक स्थिति का उल्लेख करते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी, लेकिन उसके खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई नहीं की.
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