2027 में BJP से इतनी सीटें मांग सकते हैं जयंत चौधरी, पता चल गई अंदर की बात!

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले एनडीए में सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं तेज हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयंत चौधरी शुरुआत में 50 सीटों की मांग कर सकते हैं, लेकिन भाजपा और आरएलडी के बीच 25-30 सीटों पर समझौता होने की संभावना है.

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यूपी तक

• 05:18 PM • 08 Jun 2026

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UP Election 2027: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. एनडीए (NDA) गठबंधन के भीतर सीटों के बंटवारे को लेकर अभी से कयास लगाए जाने लगे हैं. हर किसी की नजर इस बात पर है कि राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के प्रमुख जयंत चौधरी भाजपा से कितनी सीटों की मांग करेंगे और उनकी चुनावी रणनीति क्या होगी?

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यूपी तक से बातचीत के दौरान वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र शर्मा ने जयंत चौधरी की इस रणनीति और सीटों के गणित को बेहद आसान भाषा में समझाया है.

कितनी सीटों पर बन सकती है बात? 

सीटों की संख्या को लेकर पत्रकार पुष्पेंद्र शर्मा का मानना है कि जयंत चौधरी शुरुआत में भाजपा के सामने करीब 50 सीटों की डिमांड रख सकते हैं. हालांकि, बातचीत के बाद दोनों दलों के बीच आखिर में 25 से 30 सीटों पर समझौता होने की उम्मीद है. यह संख्या भाजपा और आरएलडी दोनों के लिए व्यावहारिक और तर्कसंगत मानी जा रही है.

रणनीतिक सीटों पर रहेगा जोर

जयंत चौधरी गठबंधन में सीट मांगते समय बहुत ही समझदारी से काम लेंगे. वे भाजपा से गाजियाबाद, नोएडा या साहिबाबाद जैसी सीटें नहीं मांगेंगे, क्योंकि ये भाजपा के मजबूत गढ़ हैं. इसके बजाय आरएलडी उन सीटों पर जोर देगी, जहां पिछली बार भाजपा हार गई थी या कमजोर स्थिति में थी. जहां आरएलडी का अपना मजबूत जनाधार भाजपा के काम आ सके.

मुरादाबाद की ठाकुरद्वारा जैसी सीटों पर ध्यान देना इसी रणनीति का हिस्सा है ताकि दोनों दल मिलकर नए समीकरण बना सकें. हालांकि, विश्लेषण के अनुसार सब कुछ इतना आसान भी नहीं होगा. मेरठ दक्षिण जैसी कुछ खास सीटों पर दावेदारी को लेकर दोनों पार्टियों के बीच पेच फंस सकता है और बात अटक सकती है.

मुस्लिम वोटर्स और सोशल इंजीनियरिंग पर नजर

जयंत चौधरी सिर्फ अपनी पारंपरिक जमीन (जैसे बुलंदशहर, हाथरस, मथुरा) तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे अपनी पार्टी का दायरा बढ़ा रहे हैं. इसके लिए उन्होंने के.सी. त्यागी और अशोक यादव जैसे अनुभवी नेताओं को जोड़कर एक 'थिंक टैंक' तैयार किया है.

इसके साथ ही, जयंत चौधरी ने भाजपा के साथ रहते हुए भी कभी कोई ऐसा बयान नहीं दिया जिससे मुस्लिम समुदाय नाराज हो. उन्होंने मुस्लिम हितों से जुड़े मुद्दों पर कई बार आवाज उठाई है. जानकारों का मानना है कि इस वजह से मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से आरएलडी से छिटके नहीं हैं और चुनाव में इसका फायदा गठबंधन को मिल सकता है.

BJP के लिए 'बोझ' नहीं, 'सहयोगी' हैं जयंत

वरिष्ठ पत्रकार का मानना है कि भाजपा के लिए आरएलडी कोई बोझ नहीं है, बल्कि एक मजबूत सहयोगी है. पिछले चुनावों के नतीजों के बाद भाजपा यह अच्छी तरह समझ चुकी है कि जीत के अंतर को बढ़ाने और किसी भी तरह के नुकसान से बचने के लिए जयंत चौधरी जैसे साथियों की भूमिका कितनी जरूरी है.