हेड कांस्टेबल की विधवा को मिलेंगे 50 लाख, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को दिया आदेश

यूपी तक

• 08:00 AM • 09 Jul 2026

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कोरोना महामारी के दौरान ड्यूटी करते हुए जान गंवाने वाले हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप की पत्नी को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है.

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लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट  ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि कोरोना महामारी के दौरान ड्यूटी करते हुए जान गंवाने वाले हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप की विधवा, सीमा भारती को 50 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए. हाईकोर्ट ने साफ किया कि कोरोना काल में आवश्यक सेवाओं से जुड़े हर सरकारी कर्मचारी को 'कोविड ड्यूटी' पर ही माना जाना चाहिए.

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जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस ए. के. चौधरी की बेंच ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस पुराने फैसले को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत सीमा भारती के मुआवजे के दावे को अमान्य घोषित कर दिया गया था. अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि मुआवजे की राशि आगामी आठ हफ्तों के भीतर जारी की जाए.

सरकार की दलील और कोर्ट की फटकार

दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने 27 अगस्त 2024 को एक आदेश जारी कर सीमा भारती के दावे को खारिज कर दिया था. सरकार का तर्क था कि हेड कांस्टेबल बलवंत प्रताप कोरोना की रोकथाम, इलाज या कंटेनमेंट जोन की ड्यूटी में सीधे तौर पर तैनात नहीं थे. इसलिए वे सरकार की 11 अप्रैल 2020 की मुआवजा नीति के दायरे में नहीं आते.

हाईकोर्ट ने सरकार की इस संकीर्ण सोच पर कड़ा ऐतराज जताया. कोर्ट ने दस्तावेजों को खंगालते हुए पाया कि चीफ मेडिकल ऑफिसर (CMO) और खुद पुलिस विभाग द्वारा जारी सर्टिफिकेट यह साबित करते हैं कि बलवंत प्रताप कोरोना काल में लोगों को जागरूक करने और संक्रमितों की मदद करने की ड्यूटी पर तैनात थे. खुद पुलिस विभाग ने उनके परिवार को यह आर्थिक मदद देने की पुरजोर सिफारिश की थी.

'कोविड ड्यूटी' का दायरा बड़ा है

कोविड ड्यूटी शब्द को बहुत छोटे और सीमित दायरे में नहीं देखा जा सकता. इसका मतलब सिर्फ अस्पताल में मरीजों का इलाज करने वालों तक ही सीमित नहीं है.

 

- इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच)

अदालत ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए एक बेहद मानवीय और तार्किक बात कही. कोर्ट ने कहा कि महामारी के उस खौफनाक दौर में पुलिस, बिजली, पानी और टेलीफोन जैसी आवश्यक सेवाओं से जुड़े जितने भी कर्मचारी सड़कों पर थे, वे सब अपनी जान जोखिम में डालकर 'कोविड वॉरियर्स' की तरह काम कर रहे थे. उन्हीं की वजह से लॉकडाउन और रोकथाम की व्यवस्था सुचारू रूप से चल पाई.

सिस्टम की बेरुखी पर मानवीय फैसला

एक ऐसे समय में जब देश महामारी से जूझ रहा था, पुलिसकर्मियों ने फ्रंटलाइन पर रहकर अपनी जान की बाजी लगाई. ऐसे में तकनीकी खामियां निकालकर किसी शहीद के परिवार को उसके हक से महरूम करना कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता.