100 करोड़ की मिल कुर्क, जेल में पूरा परिवार, कैसे खाक हो गया बाहुबली विजय मिश्रा का जलवा-जलाल

रजत सिंह

• 08:12 PM • 08 Jul 2026

Bahubali Vijay Mishra Story: पूर्वांचल के बाहुबली विजय मिश्रा की अपराध से राजनीति तक की कहानी फिर चर्चा में है. मुंबई की 100 करोड़ की मिल कुर्क होने के बाद उनका कभी ताकतवर रहा साम्राज्य ढहता नजर आ रहा है.जबकि पूरा परिवार कानूनी कार्रवाई झेल रहा है.

Bahubali Vijay Mishra Story

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Bahubali Vijay Mishra Story: वे लोग जो समझते हैं कि वेब सीरीज मिर्जापुर के कालीन भैया, मुन्ना भैया और गुड्डू भैया का भौकाल ही सबसे बड़ा था, उन्हें पूर्वांचल की असली धरती का इतिहास जरूर जानना चाहिए. एक दौर था जब पूर्वांचल की सियासत और ठेकेदारी पर एक ऐसे ब्राह्मण बाहुबली का सिक्का चलता था जिसके आगे मिर्जापुर के सारे किरदार फेल थे, नाम था विजय मिश्रा.

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भदोही और ज्ञानपुर के इलाके में कभी जिसकी तूती बोलती थी आज उसका अरबों का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह चुका है. ताजा खबर यह है कि मुंबई में बाहुबली विजय मिश्रा की 100 करोड़ रुपये की एक मिल को कुर्क कर लिया गया है. अपराध की दुनिया से राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने वाले इस बाहुबली की कहानी जितनी आलीशान थी उसका अंत उतना ही दर्दनाक है. आज विजय मिश्रा खुद उम्रकैद काट रहे हैं, पत्नी-बेटा और बहू जेल में हैं, राजनीति खत्म हो चुकी है और संपत्ति लगातार जब्त हो रही है.

कोयले के धंधे से कोर्ट रूम मर्डर तक की कहानी

विजय मिश्रा की कहानी की शुरुआत भदोही और प्रयागराज से होती है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय जब पूर्वांचल में छात्र राजनीति और बाहुबल का केंद्र था, तब विजय मिश्रा विश्वविद्यालय से नहीं बल्कि कोयले और पेट्रोल पंप के अपने कारोबार से ताकत बटोर रहा था. बात साल 1980 की है, जब इलाहाबाद जिला अदालत परिसर में प्रकाश नारायण पांडे नाम के व्यक्ति की सरेआम गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई. इस सनसनीखेज कोर्ट रूम मर्डर में पहली बार विजय मिश्रा का नाम सामने आया. यह वही कांड था जिसने विजय मिश्रा को जरायम की दुनिया में पहचान दी और नियति का खेल देखिए कि इसी केस ने अंत में उसके पतन की स्क्रिप्ट भी लिखी.

देश का सबसे बड़ा फिरौती कांड और मुख्तार से कनेक्शन

विजय मिश्रा का नाम साल 1997 में पूरे देश में गूंजा, जब विश्व हिंदू परिषद के कोषाध्यक्ष और बड़े कोयला व्यापारी नंद किशोर रुंगटा का उनके दफ्तर के बाहर से अपहरण कर लिया गया. शाम को फोन खटखटा और 5 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी गई जो उस दौर की सबसे बड़ी रकम थी. पैसे पहुंचा दिए गए. लेकिन रुंगटा कभी वापस नहीं लौटे (उनकी लाश आज तक नहीं मिली). सीबीआई जांच में खुलासा हुआ कि इस पूरी साजिश का मास्टरमाइंड जेल में बंद मुख्तार अंसारी था और जमीन पर इसे अंजाम देने वाला नाम विजय मिश्रा का था. हालांकि बाद में विजय मिश्रा इस केस से बरी हो गए. लेकिन उनका खौफ पूरे यूपी में स्थापित हो चुका था.

राजनीति में एंट्री

बाहुबल के बाद विजय मिश्रा ने ब्लॉक प्रमुखी के जरिए राजनीति में कदम रखा. साल 2002 में समाजवादी पार्टी ने उसे ज्ञानपुर सीट से टिकट दिया और वह पहली बार विधायक बनें. इसके बाद वह लगातार चार बार विधानसभा पहुंचे. विजय मिश्रा की हनक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उत्तर प्रदेश में मायावती (बसपा) की पूर्ण बहुमत की सरकार थी और उपचुनावों में हमेशा सरकारी तंत्र की जीत होती थी, तब भी विजय मिश्रा ने बसपा सरकार के नाक के नीचे अपनी प्रत्याशी मधुबाला पासी को चुनाव जितवा दिया और अपनी पत्नी रामलली मिश्रा को एमएलसी बनवाया.

नंदी बम ब्लास्ट और राकेश धर से अदावत

बसपा सरकार के दौरान प्रयागराज में नंदी के घर के पास एक स्कूटर में रिमोट बम लगाकर तगड़ा ब्लास्ट किया गया था. इस हमले में नंदी के कई सहयोगी मारे गए और नंदी खुद मौत के मुंह से एयर एंबुलेंस के जरिए लखनऊ पहुंचकर बाल-बाल बचे थे. इस रिमोट ब्लास्ट में भी मुख्य आरोपी विजय मिश्रा ही थे.

भदोही-हंडिया इलाके के कद्दावर नेता राकेश धर त्रिपाठी के साथ विजय मिश्रा की वर्चस्व की ऐसी खूनी लड़ाई चली कि राकेश धर के भाई मुन्ना त्रिपाठी की हत्या समेत कई लाशें इस गैंगवार में गिरीं.

2017 की मोदी लहर में भी जीता चुनाव

साल 2017 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने साफ-सुथरी छवि के लिए विजय मिश्रा को सपा से साइडलाइन कर दिया था. उस साल जब यूपी में प्रचंड मोदी लहर चल रही थी और बड़े-बड़े दिग्गज उड़ गए, तब विजय मिश्रा बिना किसी बड़े दल के, सिर्फ संजय निषाद की 'निषाद पार्टी' के सिंबल पर निर्दलीय अंदाज में चुनाव जीत गया.

आखिरी तेवर, राजा भैया पर आरोप और सब कुछ खाक

योगी सरकार के आते ही विजय मिश्रा के बुरे दिन शुरू हो गए. उन्हें मध्य प्रदेश से गिरफ्तार कर जेल भेजा गया. जेल जाते वक्त उनके आखिरी तेवर देखने लायक थे, जब उन्होंने सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाया. एक पेशी के दौरान उन्होंने मीडिया के सामने चिल्लाते हुए बाहुबली धनंजय सिंह, सुशील सिंह और राजा भैया (रघुराज प्रताप सिंह) पर अपने परिवार को खत्म करने की साजिश रचने का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि उनका संबंध मुख्तार से नहीं बल्कि ब्रजेश सिंह से रहा है.

2027 से पहले जीते जी अंत

लेकिन उन तेवरों के बाद कानून का शिकंजा ऐसा कसा कि विजय मिश्रा जीते जी इतिहास बन गए. प्रकाश नारायण पांडे हत्याकांड में उन्हें कोर्ट से उम्रकैद की सजा हो गई. सिर्फ वही नही बल्कि अवैध हथियार रखने, जालसाजी और जमीनों पर कब्जे के मामलों में उनकी पत्नी, बेटा विष्णु और बहू भी जेल की सलाखों के पीछे सजा काट रहे हैं.

गैंगस्टर एक्ट के तहत भदोही प्रशासन उनकी अरबों की संपत्तियों को लगातार कुर्क कर रहा है, जिसमें अब मुंबई की 100 करोड़ की मिल भी शामिल हो गई है. कभी ज्ञानपुर (भदोही) की राजनीति का भाग्य विधाता माने जाने वाला मिश्रा परिवार आज पूरी तरह बिखर चुका है. साल 2027 के चुनाव नजदीक हैं और चर्चाएं हैं कि क्या जेल से कोई निर्दलीय पर्चा भरेगा. लेकिन सच यह है कि पूर्वांचल के इस बाहुबली का साम्राज्य अब पूरी तरह जमींदोज हो चुका है.