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मेहदावल में 'ब्राह्मण vs ब्राह्मण' की जंग, क्या 5000 वोटों की टीस मिटा पाएगी समाजवादी पार्टी?

Mehdawal vidhaanasabha: मेहदावल विधानसभा सीट पर इस बार चुनाव का मुकाबला बेहद करीब है जहां दो ब्राह्मण प्रत्याशी हैं. समाजवादी पार्टी के जयराम पांडेय और बीजेपी-निषाद पार्टी के अनिल त्रिपाठी के बीच केवल पांच हज़ार दो सौ तेईस वोटों का अंतर रहा. यह सीट संत कबीर नगर जिले में है और यहां की महत्वपूर्ण केंद्रीय जातियाँ निषाद, मुसलमान, ब्राह्मण और अन्य समावेशी समूह हैं.

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Mehdawal vidhaanasabha:संत कबीर नगर की मेहदावल विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की उन सीटों में से है जहां जीत और हार का फासला बेहद कम रहा है. 2022 के चुनाव में यहां दो ब्राह्मण चेहरों के बीच ऐसी टक्कर हुई कि हार-जीत का अंतर महज 5,223 वोटों पर सिमट गया. एक तरफ निषाद पार्टी-बीजेपी गठबंधन के अनिल त्रिपाठी हैं तो दूसरी तरफ सपा के जयराम पांडेय. 2027 की आहट के बीच सवाल यही है कि क्या इस बार समीकरण पलटेंगे या विधायक जी का 'सेवा भाव' फिर रंग लाएगा?

अनिल त्रिपाठी: 'मैं राजनीति नहीं सेवा करने आया हूं'

निषाद पार्टी के सिंबल पर चुनाव जीते अनिल त्रिपाठी खुद को राजनीतिज्ञ से ज्यादा समाजसेवक के तौर पर पेश करते हैं. उनका दावा है कि वे 365 दिन जनता के सुख-दुख में मौजूद रहते हैं. विधायक का कहना है कि 'मेहदावल का हर बच्चा और बुजुर्ग मेरा परिवार है. मैं बिना किसी जाति, धर्म या भेदभाव के सेवा करता हूं. मुझे पीएम मोदी और सीएम योगी के विजन पर पूरा भरोसा है कि जनता विकास के नाम पर फिर से साथ देगी.'

जयराम पांडेय: "वोट काटे गए, इसलिए पिछड़ गया"

सपा के जयराम पांडेय अपनी हार को साजिश और तकनीकी चूक करार देते हैं. उनका मानना है कि अगर उनके वोट न कटे होते तो नतीजा कुछ और होता. सपा प्रत्याशी का दावा है कि '2022 में करीब 13 हजार यादव-मुस्लिम वोट डिलीट कर दिए गए और हमारा व्यक्तिगत वोट भी काटा गया. लगभग 22 हजार वोटों का नुकसान हुआ वरना हम 4 हजार से भी कम वोटों के अंतर से चुनाव हार रहे थे. इस बार मैं कसम खाकर एक-एक वोट जुड़वा रहा हूं.'

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स्थानीय पत्रकारों की राय: सपा का पलड़ा भारी या बीजेपी की वापसी?

क्षेत्रीय पत्रकारों का मानना है कि वर्तमान में इस सीट पर 'त्रिकोणीय' सक्रियता दिख रही है. अनिल त्रिपाठी (वर्तमान विधायक), राकेश सिंह बघेल (पूर्व बीजेपी विधायक) और जयराम पांडेय (सपा) तीनों ही मैदान में डटे हैं. स्थानीय स्तर पर यूजीसी और कुछ अन्य सरकारी फैसलों को लेकर युवाओं में गुस्सा देखा गया है जिसका लाभ सपा को मिल सकता है.पत्रकारों के अनुसार वर्तमान में सपा का पलड़ा थोड़ा भारी दिख रहा है. लेकिन 2027 तक यह माहौल कितना टिकेगा यह चुनावी घोषणा के समय के ध्रुवीकरण पर निर्भर करेगा.