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Mood Kya Hai Pilibhit: पीलीभीत में बीजेपी छोड़ सपा में क्यों जा रहे नेता, पत्रकारों ने बताया सभी सीटों का हाल!

पीलीभीत में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी समीकरण बदल रहे हैं. भाजपा के चारों सीटों पर कब्जे के बावजूद गुटबाजी, महंगाई, शिक्षा और नेताओं के दल बदलने से सपा मजबूत दिख रही है. पत्रकार चौपाल में मुकाबला 2-2 सीटों का अनुमान जताया गया.

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Mood Kya Hai Pilibhit: उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों को लेकर पीलीभीत जिले की राजनीतिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं. वर्तमान में जिले की चारों विधानसभा सीटों-पीलीभीत सदर, बीसलपुर, बरखेड़ा और पूरनपुर पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है. हालांकि स्थानीय पत्रकारों की चौपाल के विश्लेषणात्मक आकलन के अनुसार, 2027 में भाजपा के लिए चारों सीटें बचाना आसान नहीं होगा.

भाजपा के भीतर खुलकर सामने आ रही अंदरूनी गुटबाजी, जन-प्रतिनिधियों के बीच आपसी लड़ाई, महंगाई, शिक्षा और चीनी-पेट्रोल से जुड़े स्थानीय व राष्ट्रीय मुद्दों के चलते समीकरण तेजी से बदल रहे हैं. इसके साथ ही हेमराज वर्मा, रतेश गंगवार और अशोक राजा जैसे प्रमुख नेताओं के भाजपा व अन्य दलों को छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल होने से सपा मजबूत स्थिति में दिख रही है. अगर सपा सही उम्मीदवार तय करती है तो मुकाबला 50-50 का हो सकता है और सपा भाजपा के इस गढ़ में सेंध लगा सकती है.

4 सीटों का गणित: क्लीन स्वीप से 2-2 की फाइट तक

पत्रकारों का मानना है कि इस बार चारों सीटों पर भाजपा का एकतरफा दबदबा नहीं रहेगा. अगर समाजवादी पार्टी पीडीए (PDA) फॉर्मूले के तहत सही टिकट वितरण करती है तो आंकड़ा 2 सीटें भाजपा और 2 सीटें सपा के पक्ष में जा सकता है. भाजपा और बीएसपी छोड़कर आए प्रमुख नेताओं (हेमराज वर्मा, रतेश गंगवार, अशोक राजा, फूल बाबू) के जुड़ने से सपा का ओबीसी, कुर्मी, लोध, मुस्लिम और सिख समीकरण मजबूत हुआ है.

पीलीभीत सदर 

पूर्व मंत्री हेमराज वर्मा के सपा में आने से यह जिले की सबसे हॉट सीट बन गई है. यदि सपा उन्हें सदर विधानसभा से मैदान में उतारती है तो भाजपा (संजय सिंह गंगवार) के साथ सीधी और कांटे की टक्कर होगी. भाजपा के भीतर नगर पालिका अध्यक्ष और स्थानीय नेताओं के बीच चल रही अंदरूनी खींचतान का नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है.

बीसलपुर विधानसभा

बीसलपुर में 20 सालों से ब्लॉक प्रमुखी और जिला पंचायत में मजबूत पकड़ रखने वाले रतेश गंगवार के सपा में शामिल होने से सपा का पलड़ा भारी दिख रहा है. अखिलेश यादव द्वारा पिछली बार बड़ी हार झेल चुके प्रत्याशियों (जैसे दिव्या गंगवार) पर विचार न करने के संकेत के बाद, रतेश गंगवार को मजबूत विकल्प माना जा रहा है.

बरखेड़ा विधानसभा

बरखेड़ा को परंपरागत रूप से भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है, जहां ओबीसी मतदाता बड़ी संख्या में हैं. हालांकि बरखेड़ा क्षेत्र को अलग तहसील न बनाए जाने का पुराना मुद्दा, वर्तमान विधायक और स्थानीय नेताओं/कार्यकर्ताओं के बीच तल्खी और महंगाई के मुद्दे के कारण इस बार मुकाबला दिलचस्प हो सकता है.

पूरनपुर (आरक्षित सीट)

भाजपा विधायक बाबूराम पासवान लगातार दो बार से इस सीट पर काबिज हैं जिससे 10 साल की एंटी-इन्कंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) देखने को मिल रही है. भाजपा छोड़कर सपा में आए अशोक राजा की दावेदारी और सपा के गढ़ को वापस पाने की रणनीति से यहाँ मुकाबला 50-50 का माना जा रहा है.

चुनावी नतीजे तय करने वाले प्रमुख मुद्दे

पत्रकारों के अनुसार, 2027 का चुनाव सिर्फ जातिगत समीकरणों पर नहीं, बल्कि धरातल के प्रमुख मुद्दों पर होगा.

महंगाई व रोजमर्रा की जरूरतें: चीनी के दाम बढ़कर ₹75/किलो तक पहुंचना, प्याज की बढ़ती कीमतें और गाड़ियों में E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से आ रही दिक्कतों को लेकर आम जनता में असंतोष है.

शिक्षा और स्कूल व्यवस्था: जिले में 158 प्राथमिक विद्यालयों का विलय (मर्जर), जर्जर भवन और छात्रों/युवाओं (Gen-Z) के आंदोलन से शिक्षा एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनता दिख रहा है.

भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी: विधायक बनाम चेयरमैन और विधायक बनाम ब्लॉक प्रमुख की आपसी लड़ाई तथा सोशल मीडिया पर जारी आरोप-प्रत्यारोप से कार्यकर्ता भ्रमित हैं जिसका सीधा फायदा समाजवादी पार्टी को मिल सकता है.

पीलीभीत की चारों सीटों पर कब्जा बरकरार रखना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है. पत्रकार चौपाल का स्पष्ट संदेश है कि 2027 के चुनाव में विकास के दावों के साथ-साथ महंगाई, शिक्षा और नेताओं का सही चयन ही जीत-हार का फैसला करेगा.

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