लेटेस्ट न्यूज़

यूपी के वो नामी नेता जिनसे चुनाव से पहले दूरी बना रहे अखिलेश, मगर कांग्रेस उन्हें गठबंधन में लाने की कोशिश में

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले सपा और कांग्रेस के गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है, लेकिन दोनों दलों की रणनीति में मतभेद सामने आ रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत श्रीवास्तव के मुताबिक, अखिलेश यादव स्वामी प्रसाद मौर्य को सपा के साथ जोड़ने के पक्ष में नहीं दिख रहे, जबकि कांग्रेस का एक धड़ा उन्हें इंडिया गठबंधन में शामिल करना चाहता है.

ADVERTISEMENT

UPTak
social share
Google CTA

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की चर्चा जारी है, लेकिन दोनों दलों की चुनावी रणनीति में अंतर साफ दिखाई दे रहा है. एक तरफ कांग्रेस स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है, तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव उनसे दूरी बनाए हुए हैं. दोनों पार्टियों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर भी सहमति नहीं बन पाई है.

सपा और कांग्रेस के नेता दिल्ली में केंद्र सरकार और बीजेपी के खिलाफ एक साथ दिखाई देते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति में दोनों की प्राथमिकताएं अलग हैं. अखिलेश यादव यूपी चुनाव को स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित रखना चाहते हैं, जबकि कांग्रेस अपनी राष्ट्रीय राजनीति और सामाजिक समीकरणों के सहारे ज्यादा सीटों पर दावेदारी कर रही है.

'यूपी Tak' के कार्यक्रम 'मुद्दे की बात' में सीनियर एडिटर नीरज गुप्ता ने वरिष्ठ पत्रकार और 'द प्रिंट' के असिस्टेंट एडिटर प्रशांत श्रीवास्तव से इन सवालों पर बातचीत की. प्रशांत श्रीवास्तव के मुताबिक, स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर दोनों दलों का अलग रुख है, लेकिन गठबंधन के सामने असली चुनौती सीटों का बंटवारा और चुनावी रणनीति तय करना है.

स्वामी प्रसाद मौर्य पर अखिलेश और कांग्रेस के अलग-अलग रुख

स्वामी प्रसाद मौर्य पहले समाजवादी पार्टी के साथ थे. 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले कई विधायकों के साथ सपा में शामिल हुए थे. उस समय उनके आने की काफी चर्चा हुई थी, लेकिन खुद फाजिलनगर सीट से चुनाव नहीं जीत सके. बाद में सपा ने उन्हें विधान परिषद भेजा. उनके बयानों को लेकर भी पार्टी को असहज स्थिति का सामना करना पड़ा.

प्रशांत श्रीवास्तव का कहना है कि अखिलेश यादव 2022 के अनुभव से सबक ले चुके हैं. उन्हें लगता है कि चुनाव में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) का मुद्दा और पार्टी का अपना राजनीतिक नैरेटिव ज्यादा जरूरी है. किसी विवादित नेता को साथ लेने से पार्टी को नुकसान भी हो सकता है.

दूसरी तरफ कांग्रेस के कुछ नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को इंडिया गठबंधन में शामिल करने के पक्ष में हैं. कांग्रेस के यूपी प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम भी इस दिशा में कोशिश कर रहे हैं. श्रीवास्तव के मुताबिक, कांग्रेस के भीतर एक धड़ा दिखाना चाहता है कि पार्टी के पास भी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के नेताओं का प्रतिनिधित्व करने वाला अलग सामाजिक समीकरण है.

कांग्रेस की ज्यादा सीटों की मांग से कैसे फंस सकता है गठबंधन?

स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर बातचीत के पीछे सीटों का गणित भी जुड़ा हुआ है. प्रशांत श्रीवास्तव के मुताबिक, कांग्रेस और सपा के बीच सीटों की संख्या को लेकर बड़ा अंतर है. सपा जहां कांग्रेस को करीब 50-55 सीटें देने के पक्ष में बताई जा रही है, वहीं कांग्रेस 100 से कम सीटों पर तैयार नहीं दिख रही.

श्रीवास्तव का मानना है कि कांग्रेस को पहले उन सीटों की पहचान करनी चाहिए, जहां उसके पास मजबूत उम्मीदवार और चुनाव लड़ने की वास्तविक स्थिति है. उनके मुताबिक, पार्टी को 50-70 संभावित मजबूत सीटों की सूची तैयार करके सपा के साथ बातचीत करनी चाहिए.

स्वामी प्रसाद मौर्य भी सिर्फ एक-दो सीटों पर संतुष्ट नहीं होंगे. आशंका जताई गई कि वह अपने और अपने समर्थकों के लिए कई सीटें चाहते हैं. अगर उनकी मांग पूरी नहीं होती है तो गठबंधन से अलग होने के बाद वह सपा और कांग्रेस दोनों पर निशाना साध सकते हैं. इससे विपक्ष के साझा चुनावी संदेश पर असर पड़ सकता है.

अखिलेश यूपी में स्थानीय मुद्दों पर ही क्यों लड़ना चाहते हैं चुनाव?

बातचीत में एक और दिलचस्प पहलू अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति का सामने आया. प्रशांत श्रीवास्तव के मुताबिक, अखिलेश नहीं चाहते कि उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव पूरी तरह राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमने लगे.

उनका मानना है कि यूपी में बीजेपी के खिलाफ लड़ाई योगी सरकार और प्रदेश के स्थानीय मुद्दों पर होनी चाहिए. दिल्ली में चुनाव आयोग या केंद्र सरकार के खिलाफ राहुल गांधी के साथ प्रदर्शन करने से प्रदेश के बूथों पर सीधे वोट नहीं मिलते. दूसरी तरफ कांग्रेस की प्रदेश इकाई अक्सर राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर ज्यादा सक्रिय दिखाई देती है. दोनों दलों की इसी अलग सोच का असर गठबंधन की रणनीति पर भी पड़ सकता है.

कुल मिलाकर, प्रशांत श्रीवास्तव की बातचीत में 2027 के यूपी चुनाव से पहले विपक्ष की तीन चुनौतियां सामने आती हैं. पहली, कांग्रेस और सपा के बीच सीटों का बंटवारा. दूसरी, छोटे दलों और नेताओं को गठबंधन में जगह देने का सवाल. तीसरी, राष्ट्रीय और स्थानीय मुद्दों के बीच चुनावी एजेंडा तय करना. स्वामी प्रसाद मौर्य को लेकर दोनों दलों के अलग रुख को भी इसी राजनीतिक खींचतान के संदर्भ में देखा जा सकता है.

ये भी पढ़ें- यूपी के चुनावी मैदान में नीतीश के बेटे की एंट्री? समझिए JDU की हिस्ट्री... कब-कब मिली जीत और कितनी सीटों पर गंवाई बाजी