अखिलेश यादव ने एक और प्रत्याशी का किया ऐलान, बीजेपी के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की बेटी को मिला टिकट
बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप और उनकी बेटी कीर्ति कश्यप की सियासी पारी अब नए मोड़ पर है. अखिलेश यादव ने कीर्ति कश्यप को बरेली की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से प्रत्याशी घोषित किया है.
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सियासी पाला बदलने का दौर तेजी से शुरू हो गया है. इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक बड़ा 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) दांव चलते हुए भाजपा का साथ छोड़कर आए पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप को बरेली की बिथरी चैनपुर से प्रत्याशी घोषित कर दिया है. इस सियासी फेरबदल और टिकट वितरण ने न केवल बरेली बल्कि आसपास के इलाकों के राजनीतिक समीकरणों को भी गरमा दिया है.
सम्मान की लड़ाई और भाजपा से दूरी
भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थामने वाली कीर्ति कश्यप ने पार्टी बदलने की मुख्य वजह 'सम्मान' को बताया है. जब उनसे यह सवाल किया गया कि क्या उन्होंने सपा के टिकट के लिए पार्टी बदली है तो उन्होंने शायराना अंदाज में आलोचकों को जवाब देते हुए कहा 'कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना... जहां सम्मान नहीं, वहां रहना नहीं.' उनके इस छोटे मगर तीखे बयान ने साफ कर दिया है कि भाजपा से उनका मोहभंग किन परिस्थितियों में हुआ.
एक तीर से कई निशाने: पीडीए और कश्यप समीकरण
समाजवादी पार्टी इस पूरे घटनाक्रम को अपनी पीडीए और सामाजिक न्याय की रणनीति की बड़ी सफलता के रूप में देख रही है.
कश्यप समाज की गोलबंदी: पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप के परिवार के सपा में शामिल होने और उनकी बेटी को टिकट मिलने से पार्टी को कश्यप बहुल क्षेत्र में मजबूत पकड़ मिलने की उम्मीद है.
अखिलेश यादव का दावा: सपा प्रमुख अखिलेश यादव का मानना है कि धर्मेंद्र कश्यप के आने से न केवल बरेली बल्कि पूरे प्रदेश में पार्टी की ताकत में इजाफा होगा और भाजपा को कड़े मुकाबले का सामना करना पड़ेगा. दूसरी ओर धर्मेंद्र कश्यप ने भी प्रदेश में कश्यप समाज की सुरक्षा और कानून व्यवस्था के मुद्दों को लेकर योगी सरकार पर कड़ा प्रहार किया है.
चुनावी मैदान और भविष्य की राह
लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों के तुरंत बाद से ही बिथरी चैनपुर सीट पर अपनी तैयारी शुरू करने का दावा करने वाली कीर्ति कश्यप के सामने अब अपनी पुरानी पार्टी (भाजपा) के गढ़ में सेंध लगाने की बड़ी चुनौती है. हालांकि पिता धर्मेंद्र कश्यप का राजनीतिक अनुभव और बड़ी संख्या में समर्थकों का सपा में शामिल होना उनके लिए फायदेमंद साबित हो सकता है. लेकिन सियासत में सिर्फ टिकट मिलने या दांव खेलने से जीत हासिल नहीं होती इसके लिए जनता के भरोसे की कसौटी पर खरा उतरना होगा.
