Mood kya Hai Shamli: शामली में 2027 की जंग दिलचस्प! 2022 में सपा-RLD ने जीती थीं तीनों सीटें, अब BJP के साथ जयंत चौधरी… क्या फिर बदलेगा चुनावी समीकरण?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज होने लगी है. पश्चिमी यूपी के शामली जिले की तीन विधानसभा सीटों शामली सदर, कैराना और थानाभवन पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने के आसार हैं.
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Mood kya Hai Shamli: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी तेज होने लगी है. पश्चिमी यूपी के शामली जिले की तीन विधानसभा सीटों शामली सदर, कैराना और थानाभवन पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने के आसार हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के गठबंधन ने जिले की तीनों सीटों पर जीत दर्ज की थी. हालांकि, अब राष्ट्रीय लोकदल बीजेपी के साथ है. ऐसे में 2022 के मुकाबले इस बार राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं. स्थानीय पत्रकारों और राजनीतिक जानकारों के मुताबिक चुनाव में गठबंधन, प्रत्याशियों का चयन, जाट-मुस्लिम मतदाताओं का रुझान और स्थानीय मुद्दे अहम भूमिका निभा सकते हैं.
2022 में सपा-आरएलडी गठबंधन ने जीती थीं तीनों सीटें
2022 के विधानसभा चुनाव में शामली जिले की तीनों सीटों पर सपा और आरएलडी गठबंधन के उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी. शामली सदर सीट से आरएलडी के प्रसन्न चौधरी ने बीजेपी के तेजेंद्र निर्वाल को हराया था. कैराना में समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन ने बीजेपी की मृगांका सिंह को शिकस्त दी थी. वहीं, थानाभवन सीट पर आरएलडी के अशरफ अली खान ने बीजेपी के तत्कालीन विधायक और पूर्व मंत्री सुरेश राणा को हराया था. उस समय सपा और आरएलडी एक साथ चुनाव लड़ रहे थे. लेकिन अब जयंत चौधरी की पार्टी बीजेपी के साथ गठबंधन में है. ऐसे में पिछले चुनाव में एक साथ रहे दल इस बार अलग-अलग राजनीतिक खेमों में नजर आ सकते हैं. इसका असर जिले की तीनों सीटों पर पड़ने की संभावना है.
शामली सदर में प्रसन्न चौधरी के सामने कौन होगा?
शामली सदर सीट पर मौजूदा विधायक प्रसन्न चौधरी की दावेदारी को लेकर चर्चा है. वह राष्ट्रीय लोकदल से विधायक हैं और पिछले चुनाव में सपा-आरएलडी गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर जीते थे. इस बार आरएलडी और बीजेपी के साथ होने से सीट पर गठबंधन की रणनीति और उम्मीदवार का चयन अहम होगा. स्थानीय राजनीतिक चर्चा में यह संभावना जताई जा रही है कि शामली सदर सीट आरएलडी के खाते में जा सकती है और प्रसन्न चौधरी को फिर मौका मिल सकता है. हालांकि, सीटों के बंटवारे और उम्मीदवार को लेकर अभी अंतिम निर्णय स्पष्ट नहीं है.
दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी की तरफ से पूर्व चेयरमैन राजेश्वर बंसल के बेटे अखिलेश अखिल बंसल के नाम की चर्चा है. स्थानीय जानकारों का मानना है कि यदि सपा किसी ऐसे उम्मीदवार को मैदान में उतारती है, जिसे जाट, मुस्लिम और व्यापारी वर्ग का समर्थन मिल सके, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है. हालांकि, किसी भी समुदाय का वोट एकतरफा किस पार्टी को मिलेगा, यह अभी तय नहीं कहा जा सकता.
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कैराना में नाहिद हसन के सामने बीजेपी की चुनौती
कैराना विधानसभा सीट पर समाजवादी पार्टी के नाहिद हसन का राजनीतिक आधार चर्चा में रहता है. वह पहले भी इस सीट से विधायक रह चुके हैं. उनकी बहन इकरा हसन कैराना से सांसद हैं. क्षेत्र में हसन परिवार की पुरानी राजनीतिक मौजूदगी को सपा के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है. स्थानीय जानकारों के मुताबिक कैराना में मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी आबादी है और चुनावी मुकाबले में यह एक अहम कारक हो सकता है. हालांकि, केवल आबादी के आधार पर नतीजे का अनुमान नहीं लगाया जा सकता. उम्मीदवार की छवि, स्थानीय मुद्दे, पार्टी संगठन और दूसरे समुदायों का रुख भी चुनाव को प्रभावित करेगा.
बीजेपी की ओर से कैराना में किसे टिकट मिलेगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है. चर्चा में यह बात सामने आई है कि पार्टी को ऐसे उम्मीदवार की तलाश करनी होगी, जो स्थानीय स्तर पर व्यापक समर्थन जुटा सके. कुछ स्थानीय वक्ताओं ने यह संभावना भी जताई कि मजबूत उम्मीदवार उतारने पर बीजेपी मुकाबले को बदल सकती है. लेकिन चुनाव से पहले किसी भी दल की जीत या हार का दावा करना जल्दबाजी होगी.
थानाभवन में सुरेश राणा की वापसी पर नजर
थानाभवन विधानसभा सीट पर पूर्व मंत्री सुरेश राणा की भूमिका को लेकर चर्चा है. 2022 के चुनाव में उन्हें आरएलडी के अशरफ अली खान ने हराया था. उस समय सपा और आरएलडी का गठबंधन था. अब आरएलडी के बीजेपी के साथ आने से इस सीट का राजनीतिक समीकरण बदल गया है. स्थानीय राजनीतिक जानकारों के मुताबिक यदि थानाभवन सीट बीजेपी के खाते में आती है, तो सुरेश राणा का नाम संभावित दावेदारों में शामिल हो सकता है. वहीं, यदि सीट आरएलडी को मिलती है, तो गठबंधन के उम्मीदवार का चयन निर्णायक होगा. फिलहाल सीटों के बंटवारे और प्रत्याशी को लेकर आधिकारिक तस्वीर स्पष्ट नहीं है.
इस सीट पर गन्ना किसानों के भुगतान, विकास कार्यों और स्थानीय समस्याओं को लेकर भी चर्चा होती रही है. 2022 के चुनाव के संदर्भ में कुछ स्थानीय वक्ताओं ने गन्ने के भुगतान में देरी से किसानों की नाराजगी का जिक्र किया. वहीं, सड़क, जाम और जलभराव जैसी समस्याओं को लेकर किए गए कामों पर भी अलग-अलग राय सामने आई. चुनाव में इन मुद्दों का कितना असर होगा, यह मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा.
भ्रष्टाचार और अधिकारियों के कामकाज पर भी उठे सवाल
यूपी तक के 'मूड क्या है शामली' कार्यक्रम में एक स्थानीय पत्रकार ने योगी सरकार के कामकाज पर अपनी राय रखते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के स्तर पर कामकाज ठीक होने के बावजूद निचले स्तर के अधिकारियों की कार्यशैली से लोगों को परेशानी हो रही है. उन्होंने जमीन और चकबंदी से जुड़े मामलों, शिकायतों के समाधान में देरी और कथित भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाया. उनका कहना था कि यदि लोगों की शिकायतों का समाधान नहीं होता है, तो इसका असर चुनाव में बीजेपी को भुगतना पड़ सकता है. हालांकि, यह स्थानीय पत्रकार की राय है, न कि जिले के सभी मतदाताओं के रुख का प्रमाण. दूसरी ओर, कार्यक्रम में कुछ वक्ताओं ने कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों को सरकार के पक्ष में महत्वपूर्ण मुद्दे बताया. ऐसे में 2027 के चुनाव में स्थानीय प्रशासन, भ्रष्टाचार की शिकायतें, कानून-व्यवस्था, किसानों के मुद्दे और विकास कार्यों को लेकर मतदाताओं की राय भी अहम हो सकती है.
जाट-मुस्लिम समीकरण और गठबंधन की भूमिका
शामली जिले की राजनीति में जाट और मुस्लिम मतदाताओं के समीकरण की अक्सर चर्चा होती है. शामली सदर सीट पर जाट, मुस्लिम और व्यापारी वर्ग की भूमिका का जिक्र किया गया, जबकि कैराना में मुस्लिम मतदाताओं और नाहिद हसन के राजनीतिक आधार पर चर्चा केंद्रित रही. थानाभवन में भी विभिन्न समुदायों के साथ-साथ उम्मीदवार की स्थानीय पकड़ को महत्वपूर्ण बताया गया. जयंत चौधरी की आरएलडी अब बीजेपी के साथ है. ऐसे में जाट मतदाताओं के रुख को लेकर राजनीतिक चर्चाएं हो रही हैं. वहीं, अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के बीच बयानबाजी का असर पश्चिमी यूपी के राजनीतिक माहौल पर पड़ने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई. हालांकि, किसी समुदाय के सभी मतदाताओं का एक ही दल के पक्ष में मतदान करना तय मानना सही नहीं होगा.
स्थानीय जानकारों का यह भी कहना है कि उम्मीदवार का व्यक्तिगत प्रभाव, पार्टी का संगठन, पिछले कार्यकाल का रिकॉर्ड और स्थानीय समस्याओं पर उसका रुख जातीय समीकरणों जितना ही महत्वपूर्ण हो सकता है.
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2027 में किस सीट पर किसका मुकाबला?
फिलहाल शामली जिले की तीनों विधानसभा सीटों पर उम्मीदवारों और गठबंधन की अंतिम तस्वीर सामने नहीं आई है. शामली सदर में प्रसन्न चौधरी और अखिलेश अखिल बंसल के नामों की चर्चा है. कैराना में नाहिद हसन की संभावित दावेदारी के साथ बीजेपी के उम्मीदवार पर नजर रहेगी. थानाभवन में सुरेश राणा की वापसी की संभावना और बीजेपी-आरएलडी के बीच सीट बंटवारे को अहम माना जा रहा है.
कुल मिलाकर, 2027 का चुनाव पिछले चुनाव से अलग राजनीतिक परिस्थितियों में होगा. 2022 में सपा और आरएलडी साथ थे, जबकि अब आरएलडी बीजेपी के साथ है. ऐसे में गठबंधन की रणनीति, प्रत्याशियों का चयन, स्थानीय मुद्दे और मतदाताओं का रुख तीनों सीटों पर मुकाबले की दिशा तय करेंगे. अभी किसी पार्टी की जीत या हार का निष्कर्ष निकालने के बजाय यह देखना अहम होगा कि चुनाव के करीब आते-आते राजनीतिक समीकरण किस तरह आकार लेते हैं.
