Opinion: यूपी में क्यों खास है निवर्तमान प्रधानों को ही प्रशासक बनाना? जानिए योगी सरकार के इस फैसले के गहरे सियासी मायने
उत्तर प्रदेश सरकार ने पंचायत चुनाव तक निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने और ओबीसी आरक्षण के लिए समर्पित आयोग गठित करने का फैसला लिया है. सरकार इसे ग्राम स्वराज, सामाजिक न्याय और ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम मान रही है.
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Opinion: एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था- ‘जब तक हम समाज के सबसे निचले स्तर पर रहने वाले व्यक्ति के आर्थिक और सामाजिक उत्थान को सुनिश्चित नहीं करते, तब तक स्वतंत्रता और लोकतंत्र के कोई मायने नहीं हैं. सत्ता का विकेंद्रीकरण ही वास्तविक लोकतंत्र की कुंजी है.’ इस दर्शन में यह निहित है कि शीर्ष पर बैठी व्यवस्था को नीचे की लोकतांत्रिक इकाइयों पर नियंत्रण न रखकर उन्हें संबल देना चाहिए. पंचायत चुनावों तक ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखना इसी दर्शन का व्यावहारिक रूप है. अब से पहले यह देखा जाता रहा है कि स्थानीय निकायों का कार्यकाल समाप्त होने या अपरिहार्य कारणों से चुनाव समय पर नहीं हो पाने पर नौकरशाही को कमान सौंप दी जाती थी. विकास खंड स्तर के अधिकारियों या सरकारी कर्मचारियों को प्रशासक नियुक्त कर दिया जाता था. लेकिन, उनमें जनता के प्रति जवाबदेही का भावनात्मक पहलू नहीं देखने को मिलता था. इसके विपरीत, एक निर्वाचित ग्राम प्रधान भले ही तकनीकी रूप से कार्यकाल पूरा कर चुका हो, लेकिन वह उसी मिट्टी, उसी परिवेश और उन्हीं लोगों के बीच रहता है. वह ग्रामीणों के सुख-दुख का सहभागी होता है और उसे पता होता है कि गांव की वास्तविक प्राथमिकताएं क्या हैं और उनके प्रति उसका भावनात्मक जुड़ाव बना रहता है.
