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Opinion: पेपर लीक से नकल विरोधी कानून तक, यूपी की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलावों की पूरी पड़ताल

बीते तीन दशक में उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाओं में नकल व नियुक्त प्रक्रियाओं में धांधली, भाई-भतीजावाद व कमीशनखोरी की घटनाओं पर नजर डालते हैं तो एक साफ पैटर्न नजर आता है कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में नकल माफिया व भर्ती सिंडिकेट ने जमकर अपने पैर पसारे.

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UP paper leak controversy News (Akhilesh Yadav and Yogi Adityanath)
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Opinion: आज के दौर में जबकि पेपर लीक जैसी घटनाओं के संबंध में निर्णायक प्रक्रिया तय की जा रही हो तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के नौजवानों के मन में यह प्रश्न भी है कि आखिर नकल संस्कृति की जड़ें कहां से शुरू हुईं और किस शासनकाल में पल्लवित पुष्पित होते हुए इतनी बड़ी बेल बन गईं. उत्तर प्रदेश की बात इसलिए भी प्रासंगिक है क्योंकि इस राज्य के अधिसंख्य युवा परीक्षाओं में अपना भविष्य देखते हैं और जब उनकी मेधा को उचित मंच नहीं मिल पाता तो वह हताशा में चले जाते हैं. प्रदेश के युवाओं का भविष्य परीक्षा कक्ष का माहौल और भर्ती बोर्ड की नीयत से तय होता है. बीते तीन दशकों में इस राज्य ने इस मोर्चे पर दो बिल्कुल विपरीत स्थितियां देखी हैं. एक समय समाजवादी पार्टी की सरकारों का दौर भी देखा जब नकल को लगभग संस्थागत छत्रछाया मिली हुई थी और भर्तियों में खुलेआम पूरी बेशर्मी से भाई-भतीजावाद चलता था. दूसरा दौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल का है, जब नकल माफिया की जड़ों पर देश का सबसे कठोर कानून बनाकर प्रहार किया गया. इन दोनों दौर की तुलनात्मक बात इसलिए कि यह उन लाखों युवाओं की सांसों से जुड़ा सवाल है, जिनकी आने वाली ज़िंदगी एक परीक्षा के परिणाम पर टिकी होती है.