Opinion: उपेक्षा से उत्कर्ष तक, पूर्वांचल का कायाकल्प और भदोही कालीन उद्योग का पुनर्जागरण
Opinion: उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक इतिहास में साल 2017 एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है. वर्ष 2017 से पहले पूर्वांचल की पहचान एक ऐसे उपेक्षित और पिछड़े क्षेत्र के रूप में होती थी, जहां समस्याओं का अंबार था और सरकारी इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव.
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Opinion: उत्तर प्रदेश के राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक इतिहास में साल 2017 एक निर्णायक मोड़ के रूप में दर्ज है. वर्ष 2017 से पहले पूर्वांचल की पहचान एक ऐसे उपेक्षित और पिछड़े क्षेत्र के रूप में होती थी, जहां समस्याओं का अंबार था और सरकारी इच्छाशक्ति का सर्वथा अभाव. पूर्वांचल का नाम आते ही मन में बदहाल सड़कें, अंधेरे में डूबे गांव-शहर, बेलगाम अपराध और थमी हुई आर्थिक गतिविधियां ही कौंधती थीं. बुनियादी सुविधाओं के अभाव और प्रशासनिक उदासीनता की सबसे बड़ी कीमत उठानी पड़ी यहां के पारंपरिक उद्योगों को, विशेषकर भदोही के विश्व प्रसिद्ध कालीन उद्योग को. जो भदोही कभी अपनी बुनाई कला और रेशमी-ऊनी कालीनों के लिए वैश्विक पटल पर भारत की धाक जमाता था, वह 2017 से पहले दम तोड़ने की कगार पर पहुंच चुका था. लेकिन 2017 के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में राज्य सरकार की दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति, त्वरित निर्णय क्षमता और विकासपरक दृष्टि ने पूर्वांचल और भदोही के परिदृश्य को 360 डिग्री बदल दिया. वर्ष 2017 से पहले उत्तर प्रदेश प्रशासनिक विफलता और नीतिगत अपंगता का शिकार था. पूर्वांचल में माफियाराज और संगठित अपराध चरम पर था. अपराधियों और बाहुबलियों का बोलबाला ऐसा था कि नए निवेशक तो दूर, स्थानीय व्यापारी और उद्योगपति भी पलायन करने को मजबूर थे. भदोही, वाराणसी और मीरजापुर जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में रंगदारी, अपहरण और धमकी
