Opinion : क्या सामाजिक न्याय के नाम पर दशकों से जातीय एकाधिकार जमाये 'यादववाद' को चुनौती देने लगे हैं ओपी राजभर?
Om Prakash Rajbhar: उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ हफ्तों से ओम प्रकाश राजभर के सोशल मीडिया पोस्ट्स ने जो हलचल मचाई है, वह महज एक तात्कालिक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है. पढ़िए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में अधिवक्ता भावेष पांडेय का यह विशेष ओपिनियन कि कैसे यह मामला दशकों से हाशिए पर पड़े गैर-यादव अति पिछड़ा वर्ग राजभर, निषाद, बिंद, कहार, प्रजापति, मल्लाह आदि जातियों के उस संचित आक्रोश और दर्द की अभिव्यक्ति हैं.
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OP Rajbhar on Akhilesh Yadav
Opinion: उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ हफ्तों से ओम प्रकाश राजभर के सोशल मीडिया पोस्ट्स ने जो हलचल मचाई है, वह महज एक तात्कालिक राजनीतिक बयानबाजी नहीं है. ये पोस्ट दशकों से हाशिए पर पड़े गैर-यादव अति पिछड़ा वर्ग राजभर, निषाद, बिंद, कहार, प्रजापति, मल्लाह आदि जातियों के उस संचित आक्रोश और दर्द की अभिव्यक्ति हैं, जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया. जब समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के तथाकथित पीडीए के नारे की जमीनी हकीकत पर तीखे सवाल उठाए जाते हैं, तो यह सीधे तौर पर लंबे समय से शोषित गैर-यादव ओबीसी समाज की आवाज बन जाता है. ओम प्रकाश राजभर के सोशल मीडिया पोस्ट असल में उसी लंबी वैचारिक और जमीनी लड़ाई का डिजिटल विस्तार है, जिसे यह समाज यादव वर्चस्व के खिलाफ लंबे समय से लड़ता आ रहा है.
