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Opinion: 'धन के निमित्त धर्म नहीं छोड़ूंगा'... सीएम योगी के इस संकल्प के सियासी और सांस्कृतिक मायने

योगी आदित्यनाथ का ‘धन के निमित्त धर्म नहीं छोड़ूंगा’ संकल्प उनकी वैचारिक सोच और सनातन धर्म के प्रति उनके रुख को दर्शाता है. डॉ. अंकित कुमार सिंह के इस ओपिनियन में समझिए कि राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम और ‘बटोगे तो कटोगे’ के संदेश के जरिए योगी आस्था, सांस्कृतिक पहचान और राजनीति को किस तरह जोड़ते हैं.

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Opinion: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह संकल्प कि ‘धन के निमित्त धर्म नहीं छोड़ूंगा’ महज एक व्यक्तिगत घोषणा नहीं है. यह उनके लंबे समय से चले आ रहे वैचारिक रुख का पुनः स्पष्टीकरण है. उन्होंने कई बार दोहराया है कि जब तक सनातन बचा रहेगा, भारत की पहचान को कोई मिटा नहीं सकता. राम मंदिर और काशी विश्वनाथ धाम का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि ये धर्मस्थल इसलिए बचे हुए हैं क्योंकि हममें जज्बा बचा हुआ है. यह बयान सिर्फ धार्मिक भावुकता नहीं, बल्कि एक सुविचारित राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेश भी है.

योगी आदित्यनाथ की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उन्होंने तुष्टीकरण की राजनीति को कभी स्वीकार नहीं किया. वोटबैंक की गणना से ऊपर आस्था को रखने का उनका रुख लगातार बना हुआ है. ‘बटोगे तो कटोगे’ का नारा उन्होंने बार-बार दोहराया है. इसका अर्थ सिर्फ सांप्रदायिक एकता का आह्वान नहीं, बल्कि सनातन समाज को एक सूत्र में बांधने का प्रयास भी है. जब वे कहते हैं कि धर्म के लिए धन नहीं छोड़ूंगा, तो वे अप्रत्यक्ष रूप से उन तमाम प्रलोभनों को खारिज कर रहे हैं जो समय-समय पर राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक सिद्धांतों से समझौता करने को प्रेरित करते हैं.

सियासी नजरिए से देखें तो यह संदेश योगी के लिए कई स्तरों पर फायदेमंद है. उत्तर प्रदेश में सनातन आस्था रखने वाला एक बड़ा वर्ग है, जो लंबे समय से यह महसूस करता रहा है कि उसकी भावनाओं को अनदेखा किया जाता रहा. राम मंदिर आंदोलन से लेकर काशी और मथुरा की चर्चा तक, योगी ने इस वर्ग को लगातार संबोधित किया है. उनका यह रुख भाजपा के मूल वैचारिक आधार को मजबूत करता है. साथ ही, विपक्षी दलों पर यह दबाव भी बनाता है कि वे आस्था के मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाएं. जब कोई नेता आस्था को वोटबैंक से ऊपर रखने की बात करता है, तो वह उन दलों को असहज स्थिति में डाल देता है जो हमेशा से तुष्टीकरण की राजनीति करते आए हैं.

सांस्कृतिक दृष्टि से यह संदेश और भी गहरा है. सनातन धर्म को सिर्फ पूजा-पाठ या अनुष्ठानों तक सीमित नहीं माना जा सकता. यह एक जीवन पद्धति है, जो भारतीय समाज की पहचान का आधार रही है. योगी जब कहते हैं कि सनातन बचा रहेगा तो भारत की पहचान बची रहेगी, तो वे उस ऐतिहासिक निरंतरता की बात कर रहे हैं जो हजारों वर्षों से चली आ रही है. राम मंदिर का निर्माण और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का विकास महज निर्माण कार्य नहीं थे. वे एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान के प्रतीक बने. इन परियोजनाओं ने यह संदेश दिया कि आस्था को राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ जोड़ा जा सकता है.

आज के समय में जब आर्थिक प्रगति और विकास को अक्सर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धार्मिक मूल्यों से अलग करके देखा जाता है, योगी का यह रुख एक अलग तर्क प्रस्तुत करता है. वे कह रहे हैं कि विकास और आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं. धन कमाना गलत नहीं, लेकिन धन के लिए धर्म छोड़ना स्वीकार्य नहीं. यह संदेश उन युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जो आधुनिक शिक्षा और वैश्विक प्रभावों के बीच अपनी जड़ों से कटने का खतरा महसूस करते हैं. सनातन को जीवित रखना कोई रूढ़िवादी एजेंडा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास का प्रतीक है.

तुष्टीकरण की राजनीति ने कई बार समाज में विभाजन पैदा किया. योगी का रुख इस विभाजन को खारिज करता है और एक व्यापक सांस्कृतिक एकता की बात करता है. ‘बटोगे तो कटोगे’ का उनका संदेश सिर्फ हिंदू समाज तक सीमित नहीं. यह समाज के हर वर्ग को याद दिलाता है कि एकता में ही शक्ति है.

आज की राजनीति में जहां अक्सर अल्पकालिक लाभ के लिए सिद्धांत बदले जाते हैं, योगी का यह संकल्प एक स्थिर वैचारिक स्थिति को दर्शाता है. यह संदेश उन नेताओं के लिए चुनौती भी है जो आस्था के मुद्दे पर अस्पष्ट रहते हैं. सनातन की रक्षा को वे भारत की पहचान की रक्षा से जोड़ते हैं. यह तर्क सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उस धारा को मजबूती देता है जो पिछले कुछ वर्षों में मुख्यधारा में आई है.

अंततः योगी आदित्यनाथ का यह बयान सिर्फ एक संकल्प नहीं, बल्कि एक दिशा-निर्देश है. यह कहता है कि आस्था को वोटबैंक की गणना से ऊपर रखना चाहिए. यह कहता है कि सनातन को बचाना भारत की सांस्कृतिक निरंतरता को बचाना है. और यह कहता है कि धन के प्रलोभन में धर्म छोड़ना न तो व्यक्तिगत रूप से स्वीकार्य है और न ही सामूहिक रूप से. सियासी और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर यह संदेश उत्तर प्रदेश और उससे आगे के समाज को एक स्पष्ट संदेश देता है-आस्था को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि उसी में हमारी पहचान सुरक्षित है.

(लेखक, डॉ. अंकित कुमार सिंह, इंडियन काउंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च में पोस्ट-डॉक्टरल फेलो हैं. सामाजिक और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं.)

(Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.)