कैसा बांका जवान था हरीश राणा और 13 साल में कितना गल गया शरीर! ये है इच्छा मृत्यु से पहले की कहानी
कभी बॉडीबिल्डिंग का शौक रखने वाला जवान हरीश राणा कैसे 13 साल तक कोमा में रहकर कंकाल बन गया? जानें इंजीनियरिंग छात्र से लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इच्छा मृत्यु दिए जाने तक की पूरी दर्दनाक कहानी.
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गाजियाबाद के हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है. सुप्रीम कोर्ट ने यह ऐतिहासिक फैसला आज यानी 11 मार्च को सुनाया. मालूम हो कि हादसे से पहले हरीश राणा सपनों से भरे एक ऊर्जावान नौजवान थे. चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हरीश को स्कूल के दिनों से ही फिटनेस और बॉडीबिल्डिंग का जबरदस्त शौक था. वह अपनी सेहत और भविष्य को लेकर बेहद गंभीर थे लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था.

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एक हंसती-खेलती जिंदगी 20 अगस्त 2013 को हमेशा के लिए बदल गई. अपने पीजी (PG) की चौथी मंजिल की बालकनी से गिरकर हरीश गंभीर रूप से घायल हो गए. सिर में आई गहरी चोटों ने न केवल उनके शरीर को बेजान कर दिया. बल्कि एक हट्टे-कट्टे नौजवान को चारदीवारी और बिस्तर तक समेट दिया.

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पिछले 13 साल हरीश के लिए एक ऐसी कैद की तरह रहे जहां वह जिंदा तो थे लेकिन पूरी तरह अचेत. दिमाग की नसें सूख जाने के कारण उनके शरीर में कोई हलचल नहीं बची. कभी-कभार पलकें झपकना ही उनके जीवित होने का एकमात्र संकेत था. वह न कुछ महसूस कर सकते थे और न ही अपनी पीड़ा बोल सकते थे.

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हरीश के पिता अशोक राणा और उनके परिवार ने अपने बेटे को बचाने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया. चंडीगढ़ PGI से लेकर दिल्ली के AIIMS और देश के तमाम महंगे निजी अस्पतालों के चक्कर काटे गए. 13 सालों तक इस उम्मीद में सेवा की गई कि शायद कोई चमत्कार हो जाए और उनका बेटा फिर से उठ खड़ा हो.

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समय के साथ हरीश का वह मजबूत शरीर जिस पर उन्हें कभी गर्व था अब गलने लगा था. मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, सिर की चोट ने उनके मस्तिष्क को इस कदर प्रभावित किया कि सुधार की सारी उम्मीदें खत्म हो गई थीं. बिस्तर पर पड़े-पड़े उनके शरीर पर गहरे घाव बन चुके थे, जो उनके दर्द को बयां कर रहे थे.

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जब डॉक्टरों ने स्पष्ट कर दिया कि रिकवरी की कोई गुंजाइश नहीं है तब परिवार ने भारी मन से 'पैसिव यूथेनेशिया' की मांग की. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने बुधवार को हरीश के लाइफ-सस्टेनिंग ट्रीटमेंट को वापस लेने की अनुमति देकर उन्हें इस असहनीय दर्द से मुक्ति का रास्ता दिया.

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सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते समय हरीश के परिवार के धैर्य की सराहना की. कोर्ट ने भावुक होते हुए कहा कि किसी से सच्चा प्यार करने का अर्थ है उनके सबसे कठिन और बुरे समय में भी उनका साथ न छोड़ना. यह आदेश हरीश को एक शांतिपूर्ण और गरिमापूर्ण विदाई देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है.
