क्या 2027 में ओवैसी बदल देंगे यूपी का चुनावी गणित? इस बीच अखिलेश ने बिछाई नई बिसात

उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी और एआईएम के बढ़ते प्रभाव से सपा-कांग्रेस सतर्क हैं।

यूपी तक

• 12:03 PM • 17 Feb 2026

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उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) मुस्लिम वोटों के समीकरण को बिगाड़ सकते हैं और क्या इससे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. आपको बता दें कि हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने हैदराबाद (ओवैसी का गढ़) का जिक्र करते हुए तीन चीजों को मशहूर बताया शेरवानी, बिरयानी और परेशानी. इसे ओवैसी पर सीधे तंज के रूप में देखा गया. 

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ओवैसी की पार्टी ने महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों में 125 से ज्यादा सीटें जीतकर तगड़ा प्रदर्शन किया है. इसके बाद यूपी में भी सपा सतर्क हो गई है. उत्तर प्रदेश में लगभग 19% मुस्लिम मतदाता हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा को करीब 77-79% और 2024 के लोकसभा चुनाव में 90% से ज्यादा मुस्लिम समर्थन मिला. 2017 में मुस्लिम वोट सपा और बसपा के बीच बंट गए थे, जिसका फायदा भाजपा को मिला और उसने 82 मुस्लिम बहुल सीटों में से 62 पर जीत दर्ज की थी. सपा 2027 में इस स्थिति से बचना चाहती है.

मुस्लिम वोटों को एकजुट रखने के लिए सपा ने हाल ही में बसपा के पूर्व दिग्गज नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी में शामिल किया है. सिद्दीकी मायावती सरकार में 'मिनी सीएम' माने जाते थे. सपा का मकसद ओवैसी और मायावती के किसी भी संभावित गठबंधन का मुकाबला करना है. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नसीमुद्दीन अब पहले की तरह जनाधार वाले नेता नहीं रहे. साथ ही, सपा में पहले से मौजूद पूर्व बसपा नेता उनकी एंट्री से नाखुश हो सकते हैं. ओवैसी का दावा है कि जब मुस्लिम नेतृत्व उभरेगा, तो अखिलेश यादव की राजनीति पर असर पड़ेगा. 

कुल मिलाकर, 2027 की जंग में मुस्लिम वोट निर्णायक होंगे और सपा-कांग्रेस गठबंधन की कोशिश ओवैसी की एंट्री को रोककर अपने इस मजबूत वोट बैंक को बचाने की है.