तीन बार से वाराणसी उत्तरी सीट जीत रही बीजेपी के लिए ये होगा बड़ा चैलेंज?

रोशन जायसवाल

21 Oct 2026 (अपडेटेड: 21 Oct 2026, 01:48 PM)

वाराणसी उत्तर विधानसभा सीट पर बीजेपी के रविंद्र जायसवाल लगातार तीन चुनाव जीत चुके हैं. जानिए सीट का सियासी इतिहास, जातीय समीकरण, सपा की रणनीति, विकास कार्य और 2027 विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सामने संभावित चुनौतियां.

Akhilesh Yadav and CM Yogi

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी की वाराणसी उत्तर विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बेहद महत्वपूर्ण केंद्र है. पुरानी बस्तियों, व्यापारिक इलाकों, शिक्षण संस्थानों और विभिन्न सामाजिक ताने-बाने से जुड़ी इस सीट पर कभी कांग्रेस और जनसंघ का मुकाबला हुआ करता था. बाद में यहां समाजवादी पार्टी (सपा) ने दबदबा बनाया और पिछले तीन चुनावों (2012, 2017, 2022) से लगातार भाजपा के रविंद्र जायसवाल यहां से जीत की हैट्रिक लगाते आ रहे हैं. हालांकि बदलते समीकरणों और जातीय ताने-बाने के बीच क्या बीजेपी के लिए इस बार राह आसान होगी या कोई नया उलटफेर देखने को मिलेगा आइए जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी इतिहास और समीकरण.

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सीट का राजनीतिक इतिहास और पार्टियों का प्रभाव

सपा और कांग्रेस का दौर: साल 1996, 2002 और 2007 के विधानसभा चुनावों में इस सीट पर समाजवादी पार्टी का मजबूत प्रभाव देखा गया, जहां हाजी अब्दुल्ला अहमद अंसारी विधायक चुने गए.

बीजेपी की हैट्रिक: साल 2012 से लगातार तीन बार से भाजपा के रविंद्र जायसवाल इस सीट पर जीत दर्ज करते आ रहे हैं. उनका दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में क्षेत्र में लगभग 95,000 करोड़ रुपये के ऐतिहासिक विकास कार्य हुए हैं.

सपा की रणनीति और पिछली चूक: पिछले चुनाव में सपा उम्मीदवार रहे अशफाक अहमद डब्ल्यू का मानना है कि यदि उन्हें टिकट मिलने में थोड़ा और समय मिलता तो मुकाबला और भी दिलचस्प होता. आगामी चुनाव में सपा अपनी नई रणनीतियों के साथ मैदान में उतरने की तैयारी में है.

जातीय समीकरण 

लगभग 4,25,000 कुल मतदाताओं वाली इस सीट पर जातीय समीकरण चुनावी हार-जीत में अहम भूमिका निभाते हैं.

बनिया/वैश्य समाज: लगभग 95,000

मुस्लिम समाज: लगभग 85,000

ब्राह्मण: लगभग 60,000

सोनकर, राजभर, पासी: लगभग 35,000

कायस्थ: लगभग 20,000

अन्य (पटेल, कुर्मी, मौर्य, यादव, विश्वकर्मा, प्रजापति आदि): लगभग 50,000

चुनावी चुनौतियां और विश्लेषकों की राय

विकास बनाम जाति: वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि हालांकि बीजेपी इस सीट को अपना मजबूत किला मानती है और यहां भारी विकास कार्य हुए हैं. लेकिन चुनावों में केवल विकास के साथ-साथ 'जाति फैक्टर' और सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इन्कम्बेंसी) भी बड़ा असर डालती है.

PDA बनाम हिंदुत्व: समाजवादी पार्टी का 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंखयक) फार्मूला और भाजपा का कोर वोटर बेस इस चुनाव को बेहद कड़ा मुकाबला बनाने जा रहे हैं. स्थानीय स्तर पर युवाओं की सोच और ध्रुवीकरण के समीकरण भी इस सीट के नतीजे तय करने में अहम होंगे.

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