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Mood Kya Hai Kanpur: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बिसात बिछने लगी है. राज्य के प्रमुख औद्योगिक शहर कानपुर में इस बार का चुनावी समीकरण बेहद टिपिकल और दिलचस्प नजर आ रहा है. स्थानीय वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के शासनकाल में कानून-व्यवस्था और अपराध नियंत्रण की स्थिति जरूर बेहतर हुई है जिसकी तारीफ मुस्लिम समुदाय और आम लोग भी कर रहे हैं. हालांकि शहर में टूटी सड़कें, पेयजल संकट, ठप पड़ा विकास और बीजेपी-सपा दोनों ही दलों के भीतर की गुटबाजी 2027 के चुनाव में बड़ा मुद्दा बनने जा रही है. 10 विधानसभा सीटों वाले कानपुर में जहां 2022 में बीजेपी गठबंधन ने 7 और सपा ने 3 सीटें जीती थीं. वहीं इस बार बीजेपी के लिए अपनी पुरानी बढ़त बनाए रखना कतई आसान नहीं होगा.
विकास ठप और बुनियादी समस्याओं से जनता में आक्रोश
वरिष्ठ पत्रकार सुधीर मिश्रा के मुताबिक, कानपुर को 'एशिया का मैनचेस्टर' कहा जाता था. लेकिन पिछले पांच सालों में शहर का औद्योगिक विकास होने के बजाय बुनियादी सुविधाएं ध्वस्त हुई हैं. शहर की ज्यादातर सड़कें टूटी हुई हैं जिसके कारण आए दिन गंभीर हादसे हो रहे हैं और लोगों की जान जा रही है. शुद्ध पीने के पानी का संकट और चारों तरफ उड़ती धूल से लोग परेशान हैं.
अधूरे प्रोजेक्ट्स: गंगा एक्सप्रेसवे का कानपुर तक न आना और कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे का उन्नाव तक सीमित रह जाना भी लोगों के बीच बड़ी निराशा की वजह बना है. स्मार्ट सिटी की फंडिंग के बावजूद धरातल पर बदलाव न दिखने का खामियाजा सत्ताधारी दल को भुगतना पड़ सकता है.
बीजेपी के भीतर गुटबाजी और नए दावेदारों का उभार
हिंदुस्तान के वरिष्ठ पत्रकार गौरव और जेएनयू/जेएन टाइम के राहुल पांडे का मानना है कि कानपुर की 10 सीटों पर इस बार लड़ाई बेहद कांटे की होगी.
स्थानीय विधायकों का विरोध: कल्याणपुर में विधायक नीलिमा कटिहार, किदवई नगर में महेश त्रिवेदी और बिल्हौर में राहुल बच्चा सोनकर जैसी सीटों पर बीजेपी के भीतर ही कई नए दावेदार मैदान में उतर आए हैं, जो मौजूदा विधायकों के खिलाफ समानांतर रैलियां और कार्यक्रम कर रहे हैं.
गुटबाजी: सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी और नगर निगम/मेयर स्तर पर भी नेताओं के बीच आपस में सामंजस्य की भारी कमी देखी जा रही है.
कानून-व्यवस्था पर योगी सरकार की तारीफ, पर पक्षपात का आरोप
टुडे हिंदी दैनिक के संपादक महूब आलम का कहना है कि मुस्लिम समुदाय विकास और बुनियादी मुद्दों पर वोट देना चाहता है.
अपराध नियंत्रण: योगी सरकार के दौरान हाई-टेक पुलिसिंग और कैमरों की वजह से अपराध पर प्रभावी नियंत्रण हुआ है जिसकी सराहना मुस्लिम समाज भी खुलकर करता है.
सहानुभूति और विकास का सवाल: सीसामऊ में इरफान सोलंकी की सजा के बाद उनकी पत्नी नसीम सोलंकी को जनता की सहानुभूति मिली. हालांकि अब जनता सिर्फ फोटो खिंचवाने के बजाय यह देख रही है कि किस क्षेत्र में विधायक निधि का कितना सही इस्तेमाल हुआ और कितना विकास हुआ है.
UGC मुद्दा, Gen-Z वोटर्स और कानपुर का वर्तमान सीट गणित
वरिष्ठ पत्रकार अभय त्रिपाठी के अनुसार, कानपुर में सामान्य वर्ग का एक बड़ा वर्ग है जो हाल ही में UGC के मुद्दों पर सड़कों पर उतरा है जिसका असर 2027 के चुनाव में साफ दिखाई देगा. साथ ही शहर के करीब 40 हजार 'Gen-Z' (युवा) मतदाता इस बार नए मिजाज में हैं.
कानपुर की 10 विधानसभा सीटों का मौजूदा गणित
बीजेपी (6 सीटें): गोविंद नगर (सुरेंद्र मैथानी), किदवई नगर (महेश त्रिवेदी), महाराजपुर (सतीश महाना), कल्याणपुर (नीलिमा कटिहार), बिठूर और बिल्हौर (राहुल बच्चा सोनकर).
अपना दल-एस (1 सीट): घाटमपुर
समाजवादी पार्टी (3 सीटें): आर्य नगर (अमिताभ बाजपेयी), सीसामऊ (नसीम सोलंकी) और कानपुर कैंट (मोहम्मद रूमी हसन).
कानपुर के वरिष्ठ पत्रकारों का लब्बोलुआब यही है कि भले ही योगी आदित्यनाथ की 'लॉ एंड ऑर्डर' की नीति से जनता संतुष्ट दिखे, लेकिन जर्जर सड़कें, हादसों की भरमार, पेयजल संकट और बीजेपी के अंदरूनी टिकट-संघर्ष के कारण 2027 में बीजेपी के लिए 2022 जैसी जीत दोहराना आसान नहीं होगा. अगर विपक्षी दल इन स्थानीय मुद्दों को भुनाने में सफल रहते हैं तो कानपुर में बीजेपी को कुछ सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है.
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