राज्यसभा में बीजेपी ने काट दिए कई टिकट, क्या यूपी विधानसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही होगा?

कुमार अभिषेक

• 10:17 AM • 06 Oct 2026

यूपी तक के खास शो 'आज का यूपी' में जानिए बीजेपी की नई राज्यसभा सूची से 2027 चुनाव पर पड़ने वाले असर, श्रुति गंगवार की एंट्री से बने नए समीकरण और सपा-कांग्रेस के बीच बढ़ती खींचतान का पूरा विश्लेषण.

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यूपी तक के खास शो 'आज का यूपी' में हम राज्य की तीन बड़ी खबरों का गहन विश्लेषण करते हैं. आज के अंक में सबसे पहले बात बीजेपी द्वारा अपने सभी 7 पुराने राज्यसभा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका देने और इससे 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी विधायकों में बढ़ी बेचैनी की से जुड़ी है. दूसरी खबर में 8वीं उम्मीदवार के तौर पर पूर्व सांसद संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को उतारकर बीजेपी द्वारा रचे गए दांव और अखिलेश यादव के सामने खड़ी हुई नई चुनौती का विश्लेषण है. तीसरी खबर में 2027 के चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच बढ़ती तल्खी, सीट शेयरिंग के विवाद और राहुल गांधी के दरवाजे पर दस्तक देते छोटे दलों के सियासी मायनों की पड़ताल शामिल है.

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राज्यसभा चुनाव में बीजेपी का बड़ा फेरबदल

भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश से अपने 8 राज्यसभा उम्मीदवारों की बहुप्रतीक्षित सूची जारी कर दी है जिसमें धर्मपाल सिंह, राधाकांत ओझा, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर, गोपी कृष्ण पांडे, प्रियंका सिंह रावत, राम प्रताप चौहान और श्रुति गंगवार के नाम शामिल हैं. इस सूची की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि पार्टी ने अपने किसी भी पुराने राज्यसभा सदस्य को रिपीट नहीं किया है. केंद्र में मंत्री रहे हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा से लेकर नीरज सिंह और बृजलाल जैसे दिग्गजों के टिकट पूरी तरह काट दिए गए हैं.

सूची में शामिल कई नाम (जैसे प्रयागराज से राधाकांत ओझा और कानपुर के गोपी कृष्ण पांडे) ऐसे हैं जिन्हें लेकर पार्टी के स्थानीय संगठन और नेताओं के बीच भी हैरानी देखने को मिली. जातीय समीकरण साधते हुए पार्टी ने लोधी समाज से धर्मपाल सिंह, खटिक (दलित) समुदाय से विद्यासागर सोनकर और अवध क्षेत्र से प्रियंका सिंह रावत को मौका दिया है.

राज्यसभा टिकटों में दिखाए गए इस सख्त रुख से यूपी बीजेपी के मौजूदा विधायकों में भारी चिंता की लहर दौड़ गई है. माना जा रहा है कि बीजेपी का यह कदम 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत है. एंटी-इंकंबेंसी का सामना कर रहे लगभग 100 से अधिक विधायकों के टिकट कटने की जो चर्चाएं चल रही थीं. राज्यसभा की इस "निर्मम" (ruthless) टिकट कटाई ने उन आशंकाओं को सच साबित करने का इशारा दे दिया है.

आठवें उम्मीदवार के रूप में श्रुति गंगवार की एंट्री और अखिलेश यादव के सामने चुनौती

बीजेपी ने अपने 8वें उम्मीदवार के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री व 7 बार के सांसद संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को अखाड़े में उतारा है. श्रुति गंगवार वर्तमान में अर्बन डेवलपमेंट बैंक की अध्यक्ष हैं और कुर्मी (ओबीसी) समाज के साथ-साथ एक महिला चेहरे के रूप में आती हैं.

बीजेपी के इस दांव ने समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव के सामने एक नया रणनीतिक संकट खड़ा कर दिया है. अगर सपा अपना तीसरा उम्मीदवार उतारती है तो उसके सामने महिला और कुर्मी बिरादरी के इस सशक्त गठजोड़ का तोड़ ढूंढने की चुनौती होगी. अखिलेश यादव को अब तय करना होगा कि वे श्रुति गंगवार के सामने किसी ओबीसी या महिला उम्मीदवार को उतारकर इस समीकरण का मुकाबला कैसे करते हैं.

सपा-कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग पर खींचतान और छोटे दलों की कांग्रेस से नजदीकी

2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन के दो प्रमुख घटकों समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच दूरियां बढ़ती नजर आ रही हैं. एक तरफ जहां कांग्रेस के नेता 200 सीटों का दावा ठोक रहे हैं और शिवपाल यादव जैसे वरिष्ठ सपा नेताओं के बयानों पर तीखे पलटवार कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी छोटे दलों के नेताओं से मुलाकातें बढ़ा रहे हैं.

हाल ही में स्वामी प्रसाद मौर्य ने राहुल गांधी और प्रियंका गांधी से मुलाकात कर अपनी तस्वीर साझा की. सूत्रों के अनुसार, उन्होंने दर्जनभर सीटों की मांग की है. हालांकि कांग्रेस उन्हें अपनी पार्टी के निशान पर चुनाव लड़ाना चाहती है. इसके अलावा महान दल के नेता संजय चौहान और अपना दल (कमेरावादी) से जुड़े पंकज निरंजन की भी कांग्रेस नेतृत्व से बातचीत की खबरें हैं.

ये सभी वे नेता हैं जो 2022 के चुनाव में अखिलेश यादव के साथ थे. लेकिन बाद में सपा से उनके रिश्ते कड़वे हो गए. अखिलेश यादव द्वारा अपने दरवाजे बंद कर लिए जाने के बाद ये नेता अब कांग्रेस के जरिए गठबंधन में एंट्री पाना चाहते हैं. कांग्रेस अपनी जमीन मजबूत करने और दबाव बनाने के लिए इन्हें साथ ले सकती है. लेकिन अखिलेश यादव के लिए इतनी बड़ी संख्या में सीटें छोड़ना लगभग नामुमकिन है. हालांकि दोनों दलों के लिए 2027 में साथ लड़ना मजबूरी है. लेकिन फिलहाल दोनों के बीच 'ऑल इज नॉट वेल' की स्थिति बनी हुई है.

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