यूपी तक के खास शो 'आज का यूपी' में हम राज्य की तीन बड़ी खबरों और सियासी घटनाक्रमों का विस्तार से विश्लेषण करते हैं. आज की पहली बड़ी खबर राज्यसभा चुनाव से जुड़ी है जहां अखिलेश यादव की तमाम तैयारियों के बावजूद समाजवादी पार्टी अपना तीसरा उम्मीदवार उतारने में नाकाम रही और संख्याबल का गणित धरा का धरा रह गया. दूसरी बड़ी खबर में जानिए कैसे बीजेपी ने संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को मैदान में उतारकर ऐसा सियासी दांव चला कि सपा को अपने कदम पीछे खींचने पड़े. वहीं तीसरी बड़ी खबर में विश्लेषण है सपा के 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नैरेटिव का जिसे राज्यसभा उम्मीदवार चयन में बड़ा झटका लगा है. जबकि बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिए बाजी अपने नाम कर ली है.
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सपा क्यों नहीं उतार पाई तीसरा उम्मीदवार? जानिए पर्दे के पीछे का गणित
राज्यसभा चुनाव के नामांकन के आखिरी दिन तक चर्चा थी कि समाजवादी पार्टी हर हाल में अपना तीसरा उम्मीदवार उतारेगी और इसके लिए कागजी तैयारी भी पूरी कर ली गई थी. हालांकि ऐन मौके पर अखिलेश यादव के एक ट्वीट के साथ साफ हो गया कि सपा मैदान में नहीं उतरेगी. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह पार्टी के भीतर रिस्क लेने की अनिच्छा और आवश्यक विधायकों का न जुट पाना रहा. वरिष्ठ मुस्लिम चेहरा सलीम शेरवानी ने हार के डर से चुनाव लड़ने से साफ मना कर दिया. इसके अलावा, बीजेपी और सहयोगियों (सुभासपा, आरएलडी) के बागी या असंतुष्ट विधायकों को साधने की सपा की कोशिशें भी नाकाम साबित हुईं. क्रॉस-वोटिंग की उम्मीदों पर पानी फिरने के बाद सपा के पास तीसरा उम्मीदवार न उतारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.
बीजेपी का मास्टरस्ट्रोक
सपा के पीछे हटने की एक बड़ी वजह बीजेपी का रणनीतिक दांव भी रहा. बीजेपी ने अपनी आठवीं सीट के लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री व झारखंड के वर्तमान राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी श्रुति गंगवार को प्रत्याशी बनाया. श्रुति गंगवार बरेली से आती हैं और कुर्मी (ओबीसी) समाज का बड़ा चेहरा हैं. अगर अखिलेश यादव उनके खिलाफ अपना तीसरा प्रत्याशी उतारते तो उन्हें एक महिला और कुर्मी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लड़ना पड़ता जो सपा के पारंपरिक ओबीसी वोट बैंक के लिहाज से राजनीतिक रूप से नुकसानदेह साबित हो सकता था. बीजेपी ने सवर्ण या धनकुबेर प्रत्याशी की जगह महिला और कुर्मी कार्ड खेलकर सपा के लिए तीसरी सीट पर चुनाव लड़ने के सभी रास्ते बंद कर दिए.
कौन पड़ा किस पर भारी?
इस चुनाव में अखिलेश यादव के बहुचर्चित 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे को गहरा झटका लगा है. सपा ने अपनी दो सीटों पर रामगोपाल यादव और धनराज नाथवानी को भेजकर पीडीए विमर्श को पीछे धकेल दिया. इसके ठीक विपरीत बीजेपी ने अपने सभी पुराने राज्यसभा सांसदों के टिकट काटकर जबरदस्त जातीय संतुलन बनाया. बीजेपी ने तीन ओबीसी (पाल, लोधी, कुर्मी), दो दलित (खटीक/सोनकर, पासी) और दो ब्राह्मण प्रत्याशियों को उतारकर न केवल अपने कोर वोट बैंक को साधा बल्कि सपा के पीडीए के काट के रूप में एक मजबूत नया नैरेटिव भी सेट कर दिया.
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