वाराणसी की ऐतिहासिक दाल मंडी में हो रहे चौड़ीकरण और विकास कार्यों के बीच एक कहानी सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है. यह कहानी है संजीव जायसवाल उर्फ 'मामा जी' की, जो कभी राम मंदिर के लिए कार सेवा में जेल गए थे, लेकिन आज अपनी आंखों के सामने अपनी रोजी-रोटी का जरिया (दुकान) उजड़ता देख भावुक हैं. संजीव जायसवाल मूल रूप से लखीमपुर खीरी के रहने वाले हैं, लेकिन पिछले 25-30 सालों से बनारस में बस गए हैं.
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वह बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के आह्वान पर उन्होंने कार सेवा की थी और इस दौरान करीब 22 दिन जेल (हिरासत) में भी रहे थे. उन्हें उम्मीद थी कि जब भाजपा की सरकार आएगी तो उन्हें नौकरी या बेहतर दिन देखने को मिलेंगे. संजीव जायसवाल की दाल मंडी में रिपेयरिंग की दो दुकानें थीं, जिन्हें चौड़ीकरण के तहत तोड़ दिया गया है.
वह दाल मंडी के माहौल की तारीफ करते हुए कहते हैं कि यहां हिंदू और मुसलमान बहुत मिल-जुलकर रहते हैं. वह अपनी दुकान रात भर खुली छोड़कर चले जाते थे और कभी कोई सामान चोरी नहीं हुआ. 'मामा जी' कहते हैं कि वह विकास के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से उनकी रोजी-रोटी छीनी गई है, उससे वह टूट गए हैं. अब उनकी उम्र नौकरी करने की नहीं रही, फिर भी वह परिवार के भरण-पोषण के लिए काम तलाश रहे हैं. वह बताते हैं कि उन्हें ₹10,000-₹12,000 की गार्ड की नौकरी ऑफर की जा रही है, जिससे घर चलाना मुश्किल है.
उनकी दो बेटियां हैं और वह अकेले कमाने वाले हैं. वह भावुक होकर पूछते हैं कि "अच्छे दिन" कहां हैं? दूसरी ओर, प्रशासन का दावा है कि इस परियोजना के तहत जिन लोगों की दुकानें तोड़ी गई हैं, उनका बकायदा रजिस्ट्रेशन कराया गया है और उन्हें मुआवजा (पैसा) दिया गया है. संजीव जायसवाल की यह कहानी विकास की चमक के पीछे छिपे उन छोटे कारोबारियों के संघर्ष को बयां करती है जिनके लिए अपनी दुकान केवल एक कमरा नहीं, बल्कि पूरी जिंदगी थी.
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