यूपी किसका: सपा से निष्कासित पूजा पाल क्या दोबारा बन पाएंगी विधायक? क्या कहता है चुनावी समीकरण

रजत सिंह

• 12:24 PM • 26 Feb 2026

Chail VidhanSabha 2027: 2027 के चुनाव में कौशांबी की चायल सीट पर पूजा पाल की साख दांव पर है. सपा से बगावत और अतीक अहमद हत्याकांड के बाद योगी की तारीफ करने वाली पूजा पाल क्या बीजेपी के टिकट पर दोबारा जीतेंगी?

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Chail VidhanSabha 2027: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 में कौशांबी की चायल सीट पर सबकी नजरें टिकी होंगी. यहां की वर्तमान विधायक पूजा पाल अब समाजवादी पार्टी से निष्कासित हो चुकी हैं. उनके निष्कासन की मुख्य वजह राज्यसभा चुनाव में बीजेपी का साथ देना और सदन में अतीक अहमद की हत्या के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था की जमकर तारीफ करना रहा. पूजा पाल के पति राजूपाल की हत्या अतीक के भाई ने की थी. ऐसे में उनका बीजेपी की ओर झुकाव एक बड़े नरेटिव को जन्म दे रहा है. लेकिन क्या यह बदलाव उन्हें 2027 में दोबारा जीत दिला पाएगा?

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पूजा पाल बनाम समाजवादी पार्टी

पूजा पाल फिलहाल एक स्वतंत्र विधायक के तौर पर पहचानी जा रही हैं. लेकिन उनका झुकाव पूरी तरह बीजेपी की तरफ है. दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी इस सीट को वापस पाने के लिए राजा भैया के करीबी और पासी समुदाय के बड़े चेहरे शैलेंद्र कुमार को मैदान में उतारने पर विचार कर रही है.

जातीय समीकरण: पासी और दलित वोट बैंक की भूमिका

चायल विधानसभा में लगभग 3,85,000 मतदाता हैं. यहां का समीकरण कुछ इस प्रकार है.

दलित (मुख्यतः पासी): करीब 1,14,000 (सबसे निर्णायक भूमिका) [02:39]

मुस्लिम: करीब 50,000

कुर्मी: करीब 38,000

ब्राह्मण: करीब 25,000

चायल में यह माना जाता है कि पासी समुदाय जिस तरफ झुकता है जीत उसी की होती है. इंद्रजीत सरोज का सपा में होना पासी वोटों को सपा की ओर खींच सकता है.जबकि पूजा पाल अतीक के आतंक से मुक्ति के नाम पर वोट मांगेंगी.

अतीक अहमद फैक्टर और योगी का नरेटिव

स्थानीय पत्रकारों की मानें तो अतीक अहमद का मारा जाना इस इलाके में एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा. पूजा पाल लगातार यह संदेश दे रही हैं कि योगी आदित्यनाथ ने उनके पति के हत्यारे के साम्राज्य को खत्म किया है. बैकवर्ड और सवर्ण वोट बैंक का बीजेपी की तरफ बढ़ता रुझान पूजा पाल के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है.

बसपा: एक महत्वपूर्ण 'वोट कटवा' या किंगमेकर?

चायल सीट पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) हमेशा से एक मजबूत फैक्टर रही है. उसे यहां लगभग हर बार 30,000 से ज्यादा वोट मिलते रहे हैं. अगर बसपा का वोट बैंक खिसकता है, तो उसका सीधा फायदा या नुकसान सपा और बीजेपी को उठाना पड़ेगा.