उत्तर प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी द्वारा जारी 8 प्रत्याशियों की सूची के बाद पूर्वांचल के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है. पार्टी ने इस बार बड़ा फेरबदल करते हुए 5 बार के सांसद रह चुके नीरज शेखर का राज्यसभा टिकट काट दिया है. उनके साथ ही जौनपुर से आने वाली सीमा द्विवेदी का भी पत्ता कट गया है. हालांकि क्षेत्रीय और जातीय संतुलन साधने के लिए भाजपा ने पूर्वांचल से इलाहाबाद बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष राधाकांत ओझा और दलित समुदाय से आने वाले पूर्व सांसद विद्यासागर सोनकर पर दांव खेला है.
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कैसा रहा नीरज शेखर का राजनीतिक सफर
नीरज शेखर की संसदीय राजनीति की शुरुआत 2007 में समाजवादी पार्टी से हुई थी.
सपा का दौर: 2008 में पिता चंद्रशेखर के निधन के बाद हुए उपचुनाव में वे बलिया से पहली बार सपा के टिकट पर सांसद चुने गए. इसके बाद 2009 में वे दोबारा लोकसभा पहुंचे. 2014 के चुनाव में भाजपा के भरत सिंह से हारने के बाद अखिलेश यादव ने उन्हें सपा के कोटे से राज्यसभा भेजा (2014-2020).
भाजपा में एंट्री: 2019 के लोकसभा चुनाव में टिकट न मिलने से नाराज होकर नीरज शेखर ने सपा और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थाम लिया. भाजपा ने उन्हें उपचुनाव के जरिए राज्यसभा भेजा और 2020 में पुनः 6 साल के लिए रीपीट किया.
2024 का झटका: 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बलिया से मैदान में उतारा. लेकिन वे सपा के सनातन पांडे से चुनाव हार गए. अब राज्यसभा का टिकट कटने से उनके भविष्य को लेकर कयासबाजी शुरू हो गई है.
बलिया में उपेक्षा या रणनीतिक खामोशी? क्या कहते हैं विश्लेषक
नीरज शेखर का नाम कटने से बलिया के स्थानीय नेता और पत्रकार भी हैरान हैं. बलिया के वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण मिश्र का मानना है कि 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों में गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, अंबेडकर नगर और बलिया जैसे जिलों में भाजपा को मिली हार का असर पूर्वांचल के प्रतिनिधित्व पर दिख रहा है.
हाल ही में हुए उत्तर प्रदेश भाजपा संगठन विस्तार और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी बलिया से किसी प्रभावशाली चेहरे को जगह नहीं मिली थी. हालांकि राजनीतिक जानकारों का कहना है कि भाजपा के पास पर्याप्त संख्याबल था और वह चाहती तो नीरज शेखर को दोबारा भेज सकती थी. लेकिन पार्टी बलिया में नए नेतृत्व की तलाश कर रही है या फिर उनके लिए कोई नई भूमिका तय की गई है.
सीमा द्विवेदी का पत्ता कटा, राधाकांत ओझा और विद्यासागर सोनकर पर दांव
सीमा द्विवेदी बाहर: जौनपुर से राज्यसभा सांसद रहीं सीमा द्विवेदी का कार्यकाल खत्म होने के बाद पार्टी ने उन्हें दोबारा मौका नहीं दिया है.
राधाकांत ओझा को मौका: इलाहाबाद बार एसोसिएशन के दो बार अध्यक्ष रह चुके राधाकांत ओझा को उच्च सदन भेजने का फैसला किया गया है.
विद्यासागर सोनकर से दलित समीकरण: खटीक समाज से आने वाले विद्यासागर सोनकर 1996 में सैदपुर सुरक्षित सीट से सांसद और हाल तक विधान परिषद सदस्य (MLC) रहे हैं. उन्हें राज्यसभा भेजकर भाजपा पूर्वांचल में सपा के 'PDA' कार्ड के जवाब में दलित (खटीक व पासी) वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रही है.
क्या 2027 के विधानसभा चुनाव में उतरेंगे बागी चेहरे?
राज्यसभा से टिकट कटने के बाद अब चर्चा इस बात की है कि क्या भाजपा इन वरिष्ठ नेताओं को राज्य की राजनीति में उतारेगी. अटकलें लगाई जा रही हैं कि नीरज शेखर बलिया सदर सीट से या उनकी पत्नी फेफना विधानसभा सीट से 2027 का चुनाव लड़ सकते हैं. वहीं सीमा द्विवेदी के भी जौनपुर की किसी विधानसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरने की चर्चाएं तेज हैं.
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