उत्तर प्रदेश के संभल हिंसा मामले में न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आ गई है. रिपोर्ट में कहा गया है कि 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा अचानक नहीं भड़की, बल्कि पूर्व नियोजित साजिश का नतीजा थी.
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रिपोर्ट में संभल सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, जामा मस्जिद प्रबंधन से जुड़े कुछ लोगों और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल की भूमिका का जिक्र किया गया है. आयोग का दावा है कि मस्जिद के सर्वे को लेकर मुस्लिम समुदाय के बीच गलत जानकारी फैलाई गई, जिससे बड़ी संख्या में लोग मौके पर इकट्ठा हुए.
आयोग का दावा- सर्वे को लेकर फैलाई गई भ्रामक जानकारी
न्यायिक आयोग के मुताबिक, अदालत के आदेश पर जामा मस्जिद के सर्वे की प्रक्रिया को लेकर लोगों के बीच गलत और भ्रामक बातें फैलाई गईं. रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे के वास्तविक उद्देश्य को छिपाया गया और लोगों से मस्जिद पर इकट्ठा होकर हर हाल में सर्वे का विरोध करने की अपील की गई.
आयोग के अनुसार, अदालत के आदेश में न तो मस्जिद को कोई खतरा था और न ही वादियों ने ऐसा कोई अनुरोध किया था. मुकदमे में मुख्य मांग एएसआई द्वारा संरक्षित स्मारक के रखरखाव और सभी के लिए प्रवेश सुनिश्चित करने से जुड़ी थी.
किन लोगों का नाम लिया गया?
रिपोर्ट में कहा गया है कि सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, जफर अली (सदर, जामा मस्जिद), मशहूद अली फारुकी (सचिव, जामा मस्जिद), प्रबंधन समिति के अन्य सदस्यों और सुहेल इकबाल ने सर्वे का विरोध करने के लिए कथित रूप से साजिश रची.
आयोग का कहना है कि इन लोगों ने मुस्लिम समुदाय को मस्जिद पर जुटने और सर्वे का विरोध करने के लिए बुलाया. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि राजनीतिक हितों और मस्जिद पर नियंत्रण बनाए रखने की मंशा से अदालत के आदेश की वास्तविक प्रकृति लोगों से छिपाई गई.
भीड़ ने लगाए भड़काऊ नारे
रिपोर्ट के मुताबिक, 24 नवंबर 2024 को बड़ी संख्या में लोग जामा मस्जिद के बाहर और आसपास जमा हुए. आयोग ने कहा कि भीड़ ने मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश की और इस दौरान "नारा-ए-तकबीर", "अल्लाह-हु-अकबर" और "गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा" जैसे नारे लगाए.
आयोग ने टिप्पणी की कि किसी भी नागरिक को कानून अपने हाथ में लेने या किसी को धमकाने का अधिकार नहीं है. किसी अपराध का फैसला और सजा तय करना केवल अदालत का अधिकार है.
हिंसा में क्या हुआ था?
आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान हालात तेजी से बिगड़ गए. पथराव, गोलीबारी और आगजनी की घटनाएं हुईं, जिनमें चार लोगों की मौत हुई थी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि मृतकों को लगी गोलियां पुलिस की नहीं थीं. वहीं, हिंसा में 28 पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें सात पुलिसकर्मियों को गोली लगी. आयोग ने यह भी कहा कि उपद्रवियों ने पुलिस के हथियार और अन्य सामान लूटने की कोशिश की थी.
पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर क्या कहा?
न्यायिक आयोग ने जिला प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को प्रभावी, संयमित और परिस्थितियों के अनुरूप बताया है. रिपोर्ट में कहा गया है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए प्रशासन ने आवश्यक कदम उठाए और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया.
भविष्य के लिए आयोग की सिफारिशें
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए अदालत के आदेशों का सम्मान करना और कानून का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है. आयोग ने राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली संगठित हिंसा के मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई की जरूरत बताई है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यदि ऐसे मामलों में आरोप सिद्ध होते हैं तो दोषियों के खिलाफ कड़े दंड, जिसमें आजीवन कारावास तक का प्रावधान शामिल है, लागू किया जाना चाहिए. साथ ही सरकार, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और समाज को मिलकर सांप्रदायिक सद्भाव और सामाजिक एकजुटता मजबूत करने की दिशा में काम करने की सलाह दी गई है.
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