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यूपी के विश्वविद्यालयों में रूल बदलेंगे? UGC के नए नियमों पर फिर विचार करेगी केंद्र सरकार

UGC के नए नियमों पर केंद्र सरकार फिर से विचार करेगी. सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने कमेटी बनाने की जानकारी दी है. इसका असर यूपी के विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों पर भी पड़ सकता है. आखिर नए नियमों पर इतना विवाद क्यों हुआ?

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विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए लागू किए गए UGC के नए नियमों पर केंद्र सरकार एक बार फिर विचार करने जा रही है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इन नियमों की समीक्षा के लिए एक विशेष कमेटी बनाई जाएगी. कमेटी सभी पक्षों की चिंताओं को सुनेगी और देखेगी कि किसी भी वर्ग के छात्र को नियमों की वजह से भेदभाव या असुरक्षा महसूस न हो.

इस फैसले का असर उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों पर भी पड़ सकता है. प्रदेश के केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों से लेकर दूसरे उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए UGC के नियमों का पालन किया जाता है. नए नियमों को लेकर विवाद के बाद अब सरकार की समीक्षा पर सबकी नजर है.

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने क्या कहा?

UGC के नए नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा.

उन्होंने कोर्ट को बताया कि सरकार सभी मुद्दों पर विचार करने के लिए एक कमेटी बनाने जा रही है. सरकार का मकसद सुनिश्चित करना है कि नियमों के कारण किसी भी वर्ग के छात्र को महसूस न हो कि उसे व्यवस्था से बाहर रखा जा रहा है या उसके साथ भेदभाव हो रहा है.

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने भी कहा कि नियम बनाते समय सभी छात्रों के हितों का ध्यान रखना जरूरी है. युवा पीढ़ी की चिंताओं और उनके भविष्य को प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

CJI ने कहा, "आप इन नियमों पर फिर से विचार क्यों नहीं करते, ताकि अगली पीढ़ी का ध्यान रखा जा सके? उन्हें हर छात्र के हित की रक्षा करनी चाहिए."

कोर्ट ने साफ किया कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें कोई भी छात्र या समूह खुद को अलग-थलग, असुरक्षित या आशंकित महसूस न करे.

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही अंतरिम रोक लगा चुका है. 29 जनवरी को सुनवाई के दौरान कोर्ट ने नियमों के कुछ प्रावधानों को पहली नजर में अस्पष्ट बताया था. साथ ही इनके गलत इस्तेमाल की आशंका भी जताई थी.

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया था. कोर्ट ने फिलहाल 2012 के पुराने UGC नियमों को लागू रखने का निर्देश दिया था.

इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ कर रही है. कोर्ट का कहना है कि भेदभाव रोकने के लिए बनाए गए नियमों में सभी छात्रों के हितों की सुरक्षा होनी चाहिए.

UGC के नए नियमों पर क्यों हुआ विवाद?

UGC ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए नए नियम अधिसूचित किए थे. इनका उद्देश्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों को जातिगत भेदभाव से बचाना था.

विवाद की मुख्य वजह नियम 3(1)(c) में दी गई जातिगत भेदभाव की परिभाषा बनी. इसमें SC, ST और OBC वर्ग के छात्रों को शामिल किया गया, लेकिन सामान्य वर्ग के छात्रों को इस परिभाषा में जगह नहीं दी गई.

इस प्रावधान का विरोध करने वालों का कहना है कि नियमों में सामान्य वर्ग के छात्रों को शामिल नहीं करने से उनके हितों की अनदेखी हो सकती है. उन्हें आशंका भी है कि अगर किसी छात्र के खिलाफ झूठी शिकायत की जाती है तो उससे निपटने के लिए नियमों में पर्याप्त स्पष्टता नहीं है.

दूसरी तरफ, नए नियमों का समर्थन करने वालों का तर्क है कि विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में वंचित समुदायों के छात्रों को जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ता है. इसे रोकने के लिए सख्त नियम और शिकायतों के निपटारे की मजबूत व्यवस्था जरूरी है.

यूपी के विश्वविद्यालयों में भी लागू होने हैं नियम

उत्तर प्रदेश में बड़ी संख्या में छात्र विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पढ़ाई करते हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, बीएचयू, डॉ. भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा और दूसरे उच्च शिक्षण संस्थानों में भी UGC के नियमों का महत्व है.

नए नियमों को लेकर विवाद के बाद फिलहाल 2012 की व्यवस्था लागू है. अब केंद्र सरकार की ओर से बनाई जाने वाली कमेटी नियमों के किन प्रावधानों में बदलाव या सुधार की सिफारिश करती है, देखना होगा. फिलहाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को कमेटी बनाने की जानकारी दी है. नियमों में बदलाव को लेकर कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है.

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