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बिल्सी सीट पर कभी बसपा का था जलवा, क्या 2027 में वो बीजेपी को दे पाएगी टक्कर?

UP Kiska: बदायूं की बिलसी विधानसभा सीट पर 2027 चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज है. जानिए सीट का इतिहास, भाजपा-सपा-बसपा की रणनीति, जातीय समीकरण, स्थानीय आकलन और किन मुद्दों पर तय हो सकती है इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले की दिशा.

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CM Yogi and Mayawati
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Bilsi Vidhan Sabha 2027: उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले की बिल्सी विधानसभा सीट का राजनीतिक मिजाज हमेशा से बेहद दिलचस्प रहा है. एक दौर था जब इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का एकछत्र राज हुआ करता था और इसे बसपा का 'अभेद्य किला' माना जाता था. लेकिन बीते एक दशक में यूपी की सियासत में आए बड़े बदलाव के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस किले को ढहाकर अपना परचम लहरा दिया. आज हालात यह हैं कि कभी जीतने वाली बसपा तीसरे नंबर पर खिसक चुकी है. वहीं साल 2022 में समाजवादी पार्टी (सपा) गठबंधन के तहत यह सीट गंवाने के बाद अब 2027 में अकेले दम पर भाजपा को चुनौती देने की तैयारी कर रही है. आइए समझते हैं बिल्सी सीट का पूरा सियासी और जातीय समीकरण जिस पर आने वाले चुनाव की दिशा तय होगी.

बिल्सी सीट का इतिहास: सुरक्षित से सामान्य होने का सफर

बिल्सी सीट का इतिहास देखें तो यह कभी अनुसूचित जाति (SC) के लिए सुरक्षित सीट हुआ करती थी.

2002: समाजवादी पार्टी के आशुतोष मौर्य ने यहां से जीत दर्ज की थी. आशुतोष मौर्य को अपने पिता और दादा की राजनीतिक विरासत का बड़ा फायदा मिला था.

2007 और 2012: इस सीट पर बसपा का 'जलवा-जलाल' रहा. 2007 में योगेंद्र सागर और 2012 में मुसरत अली ने बसपा के टिकट पर शानदार जीत हासिल की.

2017 (सामान्य सीट): परिसीमन के बाद जब यह सीट सामान्य हुई, तो भाजपा की लहर में आर.के. शर्मा ने यहां कमल खिलाया.

2022: भाजपा ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा और हरिश्चंद्र शाह (हरीश शाह) ने यहां से जीत दर्ज की.

2022 का गठबंधन और सपा की हार की वजह

साल 2022 के चुनाव में अखिलेश यादव ने कई छोटे दलों के साथ गठबंधन किया था जिसमें महान दल भी शामिल था. गठबंधन की मर्यादा के तहत यह सीट महान दल के खाते में गई और उनके प्रमुख केशवदेव मौर्य के बेटे ने सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ा. लेकिन वे भाजपा के हरीश शाह से हार गए. अब महान दल और सपा का गठबंधन टूट चुका है. सपा नेताओं का कहना है कि पिछली बार प्रत्याशी नया होने और क्षेत्र में कम संपर्क के कारण हार हुई थी. लेकिन इस बार सपा पूरी मुस्तैदी से अपनी जमीन मजबूत कर रही है.

भाजपा विधायक हरीश शाह का दावा

'हमारे टक्कर में कोई नहीं है. हम चुनाव देखकर काम नहीं करते बल्कि जिस दिन से जीते हैं, उसी दिन से हर दिन जनता के बीच में रहते हैं. आप पिछले 20 साल बनाम हमारे 5 साल का रिकॉर्ड देख लीजिए, योगी सरकार के नेतृत्व में क्षेत्र का अभूतपूर्व विकास हुआ है.'

समाजवादी पार्टी का पक्ष: सपा नेताओं का कहना है कि पिछली बार गठबंधन के कारण कुछ सीमाएं थीं. इस बार पार्टी अपने दम पर लड़ेगी, पुरानी कमियों को दुरुस्त करेगी और 2027 में बिलसी सीट जीतकर भाजपा को अपनी असली ताकत दिखाएगी.

जातीय समीकरण: किसका पलड़ा भारी?

स्थानीय राजनीतिक पंडितों के अनुसार, बिल्सी सीट का मुख्य मुकाबला मौर्य (कुशवाहा) और लोधी मतदाताओं के रुख पर निर्भर करता है. इस सीट पर कुल मतदाताओं में जातिगत आंकड़े कुछ इस प्रकार हैं.

क्षत्रिय (ठाकुर): करीब 60,000 (सबसे अधिक)

कुशवाहा/मौर्य/शाक्य: करीब 55,000

दलित मतदाता: करीब 50,000

मुस्लिम मतदाता: करीब 45,000

ब्राह्मण मतदाता: करीब 30,000

यादव मतदाता: करीब 25,000

वैश्य मतदाता: करीब 25,000

लोधी मतदाता: करीब 2,500

भाजपा के पक्ष में जाता गणित: भाजपा के लिए सबसे बड़ा फायदा यह है कि उसे क्षत्रिय, ब्राह्मण, वैश्य और लोध मतदाताओं का पारंपरिक और मजबूत समर्थन मिलता है. विपक्षी दलों के लिए इस कोर कॉम्बिनेशन को तोड़ पाना बेहद मुश्किल साबित होता है.

स्थानीय पत्रकारों का आकलन

क्षेत्र के वरिष्ठ पत्रकारों के अनुसार, वर्तमान परिस्थितियों में बिल्सी सीट पर भाजपा का किला बेहद मजबूत नजर आता है. सामान्य सीट होने के बाद से पिछले चार चुनावों में समाजवादी पार्टी यहां कभी मुख्य मुकाबले में भी नहीं आ सकी और अक्सर तीसरे नंबर पर रही है. समाजवादी पार्टी का यहां पारंपरिक रूप से मजबूत वोट बैंक नहीं रहा है और महान दल से नाता टूटने के बाद मौर्य (कुशवाहा) मतों को सहेजना भी एक चुनौती होगी.

पत्रकारों का मानना है कि बिल्सी सीट को ठाकुर बाहुल्य सीट कहा जाता है. लेकिन इतिहास में यहां से क्षत्रिय उम्मीदवार बहुत कम जीते हैं. अधिकतर पार्टियां यहां कुशवाहा/मौर्य कार्ड खेलती आई हैं. अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या 2027 के चुनाव में भाजपा वर्तमान विधायक हरीश शाह पर ही भरोसा जताएगी या कोई नया चेहरा सामने लाएगी. वहीं सपा और कभी यहां राज करने वाली बसपा किस रणनीति के साथ उतरती हैं इसी पर बिलसी की चुनावी जंग का नतीजा निर्भर करेगा.