Opinion: सपा नेताओं में बढ़ती अंतर्कलह से हताश कार्यकर्ता, चुनाव से पहले अखिलेश के पिछड़ा वोट में बगावती अंतर्द्वंद्व
Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दल अपनी चुनावी तैयारियों को धार देने में जुटे हैं. लेकिन प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी में चुनावी रणनीति और संगठन को मजबूत करने के बजाय आपसी खींचतान हावी होती दिखाई दे रही है.
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Opinion: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दल अपनी चुनावी तैयारियों को धार देने में जुटे हैं. लेकिन प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी में चुनावी रणनीति और संगठन को मजबूत करने के बजाय आपसी खींचतान हावी होती दिखाई दे रही है. पार्टी के भीतर नेताओं के बीच बढ़ती तल्खी, वर्चस्व की लड़ाई और अनुशासनहीनता ने कार्यकर्ताओं के सामने असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है. जिस पार्टी को चुनाव से पहले एकजुट होकर सत्तापक्ष को चुनौती देनी चाहिए थी, वह अपने ही नेताओं के विवाद सुलझाने में उलझी हुई है. इसका सीधा असर संगठन के मनोबल और चुनावी तैयारियों पर पड़ रहा है.
ताजा मामला जौनपुर के मछलीशहर का है, जहां सपा सांसद प्रिया सरोज और विधायक रागिनी सोनकर के बीच चल रही तल्खी से स्थानीय कार्यकर्ता परेशान हैं. सोशल मीडिया पर कई सपा कार्यकर्ता इसको लेकर निराशा जाहिर कर रहे हैं. अखिलेश यादव से हस्तक्षेप की मांग कर रहे हैं. यह विवाद केवल दो जनप्रतिनिधियों के बीच मतभेद का मामला नहीं है, बल्कि उस संगठनात्मक स्थिति को भी उजागर करता है जिसमें पार्टी के कार्यकर्ता अपने नेताओं के बीच तालमेल बनाने के बजाय उनके आपसी विवाद का बोझ उठा रहे हैं. चुनाव के समय कार्यकर्ताओं को बूथ और क्षेत्र में पार्टी का संदेश लेकर जाना होता है, लेकिन जब स्थानीय स्तर पर ही नेतृत्व के बीच खींचतान हो तो संगठन की एकजुटता का दावा कितना प्रभावी रह जाता है?
सपा में विवाद किसी एक जिले तक सीमित नहीं
मछलीशहर का घटनाक्रम कोई अपवाद नहीं है. इससे पहले रुचि वीरा और कमाल अख्तर के बीच विवाद सामने आया. बांदा में सपा विधायक और सांसद के बीच गाली-गलौज की नौबत आई. पश्चिम से पूरब तक प्रदेश के अलग-अलग जिलों से पार्टी नेताओं के बीच विवाद और मारपीट की घटनाएं भी सामने आती रही हैं. इन घटनाओं को अलग-अलग स्थानीय मामलों के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता. जब एक ही पार्टी में लगातार अलग-अलग स्तरों पर टकराव सामने आएं, तो यह संगठन के भीतर समन्वय और नेतृत्व की पकड़ पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
पिछड़ा वोट में सबसे ज्यादा तल्खी
सपा एक ओर पीडीए का नारा दे रही है. इसके जरिए वो तमाम जातीय समीकरणों को साधने में जुटी है. लेकिन अगर यूपी में पिछले कुछ समय के घटनाक्रम पर नजर डालें तो सपा के पिछड़े नेताओं में ही सबसे ज्यादा मतभेद दिखे हैं. वो चाहे अमेठी की विधायक महाराजी प्रजापति के साथ सपा नेताओं की गाली गलौज हो या चंदौली में गार्गी पटेल के साथ मारपीट. समाजवादी पार्टी की राजनीति में पिछड़ा वर्ग लंबे समय से एक महत्वपूर्ण आधार रहा है. लेकिन अब पिछड़े वर्ग से आने वाले नेताओं और जनप्रतिनिधियों के बीच ही ही वर्चस्व तेज है.
संगठन भंग करना समाधान नहीं, नेतृत्व की चुनौती
सपा के भीतर अनुशासनहीनता की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 3 महीनों में अखिलेश यादव को 7 जिलों के संगठन भंग करने पड़े हैं. यह फैसला अपने आप में बताता है कि पार्टी नेतृत्व को संगठन के भीतर गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. संगठन भंग करना तत्काल कार्रवाई जरूर हो सकती है, लेकिन इससे उन कारणों का समाधान नहीं होता जिनकी वजह से कार्यकर्ता और नेता आपस में टकरा रहे हैं. सवाल यह भी है कि अगर जिला स्तर पर संगठन लगातार विवादों में उलझे हैं, तो चुनाव के समय पार्टी का चुनावी प्रबंधन कौन संभालेगा?
स्थिति यह है कि अखिलेश यादव के अपने संसदीय क्षेत्र में भी आपसी खींचतान का असर दिखाई दिया और प्रदेश अध्यक्ष के कार्यक्रम में अपेक्षित भीड़ नहीं जुट सकी. जिस क्षेत्र को पार्टी नेतृत्व के लिए सबसे मजबूत राजनीतिक आधार के तौर पर देखा जाता है, वहां संगठन की ऐसी स्थिति नेतृत्व के लिए चेतावनी है. जब अपने ही क्षेत्र में कार्यकर्ताओं को सक्रिय और एकजुट रखना चुनौती बन जाए, तो पूरे प्रदेश में चुनावी अभियान को गति देने की राह आसान नहीं रह जाती.
चुनाव से पहले अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती
अखिलेश यादव के सामने चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करने की नहीं है, बल्कि अपनी पार्टी को भीतर से एकजुट करने की भी है. चुनाव से पहले नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई, कार्यकर्ताओं की नाराजगी और जिला संगठनों में अनुशासनहीनता सपा की चुनावी संभावनाओं को कमजोर कर सकती है. कार्यकर्ता किसी भी राजनीतिक दल की असली ताकत होते हैं. उन्हें जब अपने ही नेताओं के विवादों के बीच छोड़ दिया जाता है, तो उनका उत्साह और चुनावी सक्रियता दोनों प्रभावित होते हैं.
अखिलेश यादव भले ही भाजपा को चुनौती देने और सामाजिक समीकरणों के सहारे सत्ता में वापसी का दावा करें, लेकिन पार्टी के भीतर बढ़ती अंतर्कलह उनके दावों के सामने बड़ी बाधा बन रही है. चुनाव में केवल विपक्ष के खिलाफ माहौल बनाने से जीत नहीं मिलती, अपने संगठन को भी भरोसे, अनुशासन और एकजुटता के साथ मैदान में उतारना पड़ता है. फिलहाल सपा में यही सबसे बड़ी कमी दिखाई दे रही है. अगर अखिलेश यादव समय रहते इस बगावती अंतर्द्वंद्व पर लगाम नहीं लगा पाए, तो चुनावी मुकाबले से पहले ही पार्टी को अपने भीतर की लड़ाई का नुकसान उठाना पड़ सकता है.
(लेखक, डॉ. सुनील कुमार मिश्र, अतर्रा पी.जी. कॉलेज, बांदा में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. वे समसामयिक विषयों एवं सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं.)

Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
