Opinion: सामाजिक एकजुटता का केंद्र बनी रामनगरी... बीजेपी की हिंदुत्व पॉलिटिक्स की धुरी बनता अयोध्या में उमड़ता जनसैलाब
30 लाख दीयों से जगमगाएगी अयोध्या! राम मंदिर, श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या और विकास के जरिए योगी सरकार विरासत और सांस्कृतिक एकता का संदेश दे रही है. जानिए इसके राजनीतिक मायने.
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Opinion: अयोध्या में 07 नवंबर को भव्य दीपोत्सव का आयोजन होने जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की उम्मीद है. सरयू के तट पर 30 लाख दीये जलाने का लक्ष्य रखा गया है. 2017 से शुरू हुए दीपोत्सव की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2021 से लगातार अयोध्या का यह आयोजन गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपने ही पिछले आंकड़ों को पीछे छोड़ता आ रहा है. लेकिन पिछले एक दशक में अयोध्या में हुए सांस्कृतिक बदलाव केवल दीपोत्सव की भव्यता तक सीमित नहीं हैं. इसने रामनगरी को देशभर के करोड़ों लोगों की आस्था, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना के एक बड़े केंद्र के रूप में स्थापित किया है. इसके राजनीतिक मायने भी काफी अहम हैं. अयोध्या बीजेपी की हिंदुत्व पॉलिटिक्स की एक प्रमुख धुरी के रूप में विकसित हुई है.
दरअसल, राम मंदिर बनने के बाद अयोध्या में श्रद्धालुओं की संख्या में भारी इजाफा हुआ है. 2025 में ही करीब 30 करोड़ लोग अयोध्या पहुंचे थे. खास बात यह है कि मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचने वाले श्रद्धालुओं में अलग-अलग राज्यों, जातियों, वर्गों और सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग शामिल हैं. यही विविधता अयोध्या को एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का केंद्र बनाती है. बीजेपी की राजनीति के लिए भी इसका विशेष महत्व है, क्योंकि पार्टी लंबे समय से हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को अपनी राजनीतिक विचारधारा के प्रमुख आधार के रूप में प्रस्तुत करती रही है.
जातीय पहचान से आगे साझा सांस्कृतिक पहचान का संदेश
भारतीय राजनीति में जाति एक महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक वास्तविकता रही है. खासकर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में जातीय समीकरणों की चर्चा हमेशा प्रमुखता से होती है. राजनीतिक दलों ने अलग-अलग जातियों के आधार पर अपनी रणनीतियां बनाई हैं. लेकिन अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए पहुंच रहे लोगों की विविधता एक अलग तस्वीर सामने रखती है. यहां श्रद्धालुओं की पहचान केवल उनकी जाति या क्षेत्र से नहीं, बल्कि राम के प्रति साझा आस्था से जुड़ती है. अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोगों का एक ही धार्मिक केंद्र पर पहुंचना साझा सांस्कृतिक पहचान की व्यापकता को दर्शाता है. सनातन परंपरा में राम एक ऐसा प्रतीक हैं, जिनसे हर वर्ग खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है. चाहे निषाद हों, दलित हों या पिछड़े वर्ग के लोग.
आज भी उत्तर प्रदेश में अभिवादन के लिए 'जय राम' का संबोधन बेहद आम है. राम की यही व्यापक स्वीकार्यता जातीय बंधनों से ऊपर एक साझा पहचान का आधार बनती है. अयोध्या में रामनगरी का विकास और यहां पहुंच रहे श्रद्धालुओं की विविधता भी इसी सामाजिक जुड़ाव को रेखांकित करती है और हिंदुत्व की एकता का बोध कराती है.
अयोध्या में आए इस बदलाव और विकास से बीजेपी को भी मजबूती मिलती दिखाई देती है. उसके लिए राम मंदिर केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि ऐसा प्रतीक भी है, जिसके माध्यम से जातीय और क्षेत्रीय विभाजनों से ऊपर एक व्यापक हिंदू पहचान की बात रखी जा सकती है.
योगी का संदेश: बंटिए मत, सनातन से जुड़िए
इस विमर्श में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संदेश भी महत्वपूर्ण है. योगी लगातार सामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर सनातन परंपरा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने की बात करते हैं. उनके संदेश का राजनीतिक और सामाजिक आशय यह है कि जाति, क्षेत्र और दूसरे आधारों पर बंटने के बजाय समाज अपनी साझा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े. बीजेपी के लिए यह संदेश उसकी हिंदुत्व राजनीति को व्यापक सामाजिक आधार देने का प्रयास है.
सीएम योगी अपने भाषणों में अक्सर राम मंदिर और अयोध्या का जिक्र करते हैं. ऐसे में जब प्रदेश या देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग अयोध्या पहुंचते हैं, तो उनके भीतर अपनी हिंदुत्व की पहचान और विरासत को लेकर गर्व का भाव भी मजबूत होता है. यही वे कारण हैं, जिनसे बीजेपी को इसका राजनीतिक लाभ मिलता दिखाई देता है.
विरासत के साथ विकास का नैरेटिव
अयोध्या में बदलाव का सवाल भी इस पूरे विमर्श का अहम हिस्सा है. योगी सरकार के कार्यकाल में अयोध्या के विकास और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार को सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है. राम मंदिर के साथ शहर के बदले स्वरूप को जोड़कर विरासत और विकास का नैरेटिव तैयार किया गया है. अयोध्या पहुंचने वाले श्रद्धालु धार्मिक दर्शन के साथ शहर में हुए बदलावों को भी देखते हैं. उनके लिए रामनगरी अब केवल स्मृतियों और धार्मिक कथाओं का केंद्र नहीं, बल्कि बदलते शहरी स्वरूप का अनुभव भी है.
यही नहीं, अयोध्या में केवल राम मंदिर ही नहीं, बल्कि रामायण काल से जुड़े महापुरुषों और पात्रों को भी सम्मान दिया गया है. महर्षि वाल्मीकि के नाम पर एयरपोर्ट हो या श्रृंगवेरपुर में राम और निषादराज के गले मिलते हुए स्वरूप की प्रतिमा, इन सभी के माध्यम से अलग-अलग सामाजिक वर्गों को अपनी विरासत से जुड़ाव महसूस कराने का प्रयास किया गया है. माता शबरी की तस्वीर भी इसी सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक है. इससे हर जाति और वर्ग के लोगों को इस विरासत में अपनी भागीदारी महसूस होती है.
राम मंदिर में उमड़ती भीड़ के व्यापक सामाजिक और राजनीतिक महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. अयोध्या का राष्ट्रीय धार्मिक केंद्र के रूप में उभरना बीजेपी को अपनी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की विचारधारा को सामने रखने का एक मजबूत प्रतीक देता है. मंदिर, आस्था, सामाजिक एकजुटता और विकास- ये सभी तत्व उसके राजनीतिक नैरेटिव में एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं.
(लेखक वीरेंद्र कुमार दुबे, उत्तर प्रदेश के शिक्षा विभाग में उप शिक्षा निदेशक रहे हैं. राजनीतिक और समसामयिक विषयों पर लेखन करते हैं.)
Disclaimer: यहां व्यक्त विचार लेखक की व्यक्तिगत राय हैं.
