वाराणसी बम ब्लास्ट के दोषी वलीउल्लाह को मौत की सजा, पीड़ितों की कहानी सुन कांप जाएगी रूह

वाराणसी बम ब्लास्ट के दोषी वलीउल्लाह को मौत की सजा, पीड़ितों की कहानी सुन कांप जाएगी रूह
सांकेतिक तस्वीर.फोटो: मेल टुडे

गाजियाबाद की एक स्थानीय अदालत ने आतंकवाद के मामले में दोषी ठहराए गए वलीउल्लाह खान को वाराणसी में सिलसिलेवार बम विस्फोट करने के लिए सोमवार को मौत की सजा सुनाई. 16 साल पहले किए गए इन विस्फोटों में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई थी.

जिला सत्र न्यायाधीश जितेंद्र कुमार सिन्हा ने खान को शनिवार को 2016 में वाराणसी के संकट मोचन हनुमान मंदिर और एक रेलवे स्टेशन पर किए गए विस्फोटों के मामले में दोषी ठहराया था. खान को सोमवार को कड़ी सुरक्षा के बीच डासना जेल से जिला अदालत लाया गया.

अदालत ने खान को हत्या की कोशिश के मामले में उम्र कैद की सजा भी सुनाई और जुर्माना भरने का आदेश दिया. मौत की सजा की पुष्टि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को करनी होगी.

तकरीबन 16 साल बाद मिले इस न्याय से जिन लोगों ने अपनों को खोया था और जो इस ब्लास्ट में घायल हुए थे, उन्हें अपने जख्म पर मरहम का एहसास हुआ है. 16 साल बाद मिले न्याय पर पीड़ित और भुक्तभोगी परिवार का क्या कहना है आइए जानते हैं.

वाराणसी के लक्सा इलाके में रहने वाले हरीश वीडियो-फोटोग्राफर थे और पत्रकारिता का भी शौक रखते थे. 7 मार्च को 2016 को बनारस के संकटमोचन मंदिर में एक शादी विवाह की रिकॉर्डिंग के लिए गए थे, लेकिन घर नहीं लौटे. उनकी मौत की खबर घर पहुंची. पूरे परिवार पर गम का पहाड़ टूट पड़ा. 16 साल बाद अब उस जख्म पर मरहम लगा है, तो उनके पिता देवीदास बिजलानी को सुकून मिला है.

देवीदास बिजलानी बताते हैं कि जब उन्हें बम ब्लास्ट की खबर मिली, तब वह भागकर संकट मोचन मंदिर पहुंचे, लेकिन वहां से उन्हें अस्पताल जाने के लिए कहा गया और अस्पताल में बेटे का शव देखकर उनका दिमाग काम करना बंद कर दिया. 16 साल भले ही इंसाफ मिलने में लग गए, लेकिन हरीश के पिता देवीदास बताते हैं कि वह खुश हैं कि उन्हें न्याय मिला और यह भी मलाल नहीं है कि अगले को बचाव का मौका नहीं मिला.

बम ब्लास्ट में दूसरी दर्दनाक कहानी संतोष साहनी की है, जो वाराणसी के दुर्गा घाट इलाके में रहते हैं. 7 मार्च 2006 को संतोष शादी में शरीक होने के लिए संकट मोचन मंदिर पहुंचे थे. वहां हुए ब्लास्ट से वह बेहोश हो गए और जब होश आया तो दाहिना पैर ब्लास्ट में उड़ चुका था. संतोष बेहद गरीब परिवार के हैं. कपड़े की थैली बेचकर और फेरी लगाकर अपना गुजारा करते हैं. इस ब्लास्ट के बाद संतोष को एक लाख रुपये मुआवजा मिला था, जो शायद इनके लिए नाकाफी था.

लिहाजा अभी भी वे हर रोज जिंदगी जीने की जद्दोजहद कर रहे हैं। इस फैसले से खुश तो हैं, लेकिन हर रोज गरीबी और बेरोजगारी ने इन्हें अपंग बना दिया है. वे बताते है कि वो ब्लास्ट तो एक बार हुआ, लेकिन उनकी जिंदगी में रोज ब्लास्ट हो रहा है. उनके पास कुछ नहीं बचा है. वे बताते हैं कि अभी भी उनके शरीर मर बम का छर्रा भरा हुआ है, लेकिन इतना पैसा भी नहीं है कि वे उसको निकलवा सकें.

संतोष के अनुसार, वलीउल्लाह को फांसी की सजा से शांति तो मिली, लेकिन उनके जख्मों पर मरहम अभी भी नहीं लग सका है. कम से कम सरकार उन्हें मदद करे और रोजी-रोजगार मुहैया कराए. ताकि वह अपने परिवार और बच्चों का भरण पोषण कर सकें.

गौरतलब है साल 2006 में पहला धमाका सात मार्च 2006 को शाम 6.15 बजे लंका थाना क्षेत्र के भीड़भाड़ वाले संकट मोचन मंदिर के अंदर हुआ था.15 मिनट के बाद वाराणसी छावनी रेलवे स्टेशन पर प्रथम श्रेणी के विश्राम कक्ष के बाहर बम धमाका हुआ था. दो विस्फोटों में कम से कम 20 लोगों की मौत हो गई और करीब 100 लोग घायल हो गए.

उसी दिन दशाश्वमेध थाना क्षेत्र में एक रेलवे क्रॉसिंग की रेलिंग के पास प्रेशर कुकर बम भी मिला था.

जिला प्रशासन के वकील राजेश शर्मा ने बताया कि खान को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज दो मामलों में दोषी करार दिया गया है. उन्होंने कहा कि तीसरे मामले में आरोपी को अपर्याप्त सबूतों के कारण आरोपमुक्त कर दिया गया है.

आपको बता दें कि वाराणसी में वकीलों ने मामले की पैरवी करने से इनकार कर दिया था और इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इसे गाजियाबाद जिला अदालत में स्थानांतरित कर दिया था. तीनों मामलों में 121 गवाहों को अदालत में पेश किया गया था.

सांकेतिक तस्वीर.
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