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'भगवान बनकर आई थीं...' जिस गांव में IAS दिव्या मित्तल ने आजादी के बाद पहुंचाया था पानी, वहां लोग उनके इस्तीफे पर हुए इमोशनल

उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर का लहुरियादह गांव IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के इस्तीफे के बाद एक बार फिर चर्चा में है. दिव्या मित्तल जब मिर्जापुर की जिलाधिकारी थीं, तब उन्होंने विंध्य की पहाड़ी पर बसे लहुरियादह गांव की सालों पुरानी पानी की समस्या को करीब से देखा था और बाद में जल जीवन मिशन और हर घर नल योजना के तहत उन्हीं के प्रयासों से 31 अगस्त 2023 को पहली बार गांव में घर-घर पानी पहुंचा था.

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IAS Divya Mittal
IAS Divya Mittal Mirzapur Lahuriyadah Village Water Crisis News (Photo Edit By AI)
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IAS Divya Mittal Mirzapur Lahuriyadah Village Round Report: उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर का लहुरियादह गांव IAS अधिकारी दिव्या मित्तल के इस्तीफे के बाद एक बार फिर चर्चा में है. दिव्या मित्तल जब मिर्जापुर की जिलाधिकारी थीं, तब उन्होंने विंध्य की पहाड़ी पर बसे लहुरियादह गांव की सालों पुरानी पानी की समस्या को करीब से देखा था और बाद में जल जीवन मिशन और हर घर नल योजना के तहत उन्हीं के प्रयासों से 31 अगस्त 2023 को पहली बार गांव में घर-घर पानी पहुंचा था. आज गांव के हर घर के बाहर नल लगे हैं. इस बीच जब यूपी Tak की टीम लहुरियादह पहुंची तो क्या नजारा देखा और वहां के लोगों ने हमें क्या बताया आइए जानते हैं...

जब हमने लहुरियादह में लोगों से IAS दिव्या मित्तल के इस्तीफे की खबर के बारे में बात किया तो पता चला कि गांव के लोग उन्हें भावुक होकर याद कर रहे हैं, कोई उन्हें ‘भगवान’ तो कोई अपने जीवन में बदलाव लाने वाली अधिकारी बता रहा है.

पहाड़ पर बसे इस गांव में पानी के लिए जूझते थे लोग

मिर्जापुर की लालगंज तहसील के ड्रमंडगंज इलाके में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा के पास विंध्य की पहाड़ियों पर लहुरियादह बसा है. करीब 800 की आबादी वाले इस कस्बे में आजादी के बाद से ही पीने के पानी की समस्या रही. पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण यहां के लोग आसपास मौजूद जलस्रोतों और झरनों पर निर्भर थे. गर्मियों में जब ये स्रोत सूख जाते तो लोगों को मध्य प्रदेश के हनुमान क्षेत्र तक पानी लेने जाना पड़ता था. पानी के लिए लोगों को कई किलोमीटर का कठिन रास्ता तय करना पड़ता था.

पानी के लिए घंटों करना पड़ता था इंतजार

ग्रामीणों ने हमें बताया कि पहले प्रशासन की ओर से टैंकर की व्यवस्था की गई थी. पानी लेने के लिए लोगों को कार्ड के आधार पर प्रति व्यक्ति करीब 15 लीटर पानी मिलता था. कई बार नंबर आने का इंतजार करना पड़ता था. ग्रामीण लल्लन प्रसाद यादव ने यूपी Tak को बताया कि 'पानी को लेकर इतना तकलीफ था कि हम लोग जंगल में जाकर लेटे रहते थे. दो-तीन दिन में नंबर आता था, तब 10-15 डिब्बा भरते थे. उसी से हम लोग गुजारा करते थे.' उन्होंने बताया कि पानी की तलाश में जंगल और पहाड़ों पर जाना रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका था.

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कुएं में एक-दो लीटर पानी देखकर बदल गया था फैसला

लल्लन प्रसाद यादव ने बताया कि एक बार दिव्या मित्तल गांव में पानी की स्थिति देखने पहुंचीं. उन्होंने गांव के एक पुराने कुएं को देखा. ग्रामीणों के अनुसार करीब 135 हाथ गहरे उस कुएं में भी पानी बेहद कम था. महिलाएं वहां से एक-दो लीटर पानी निकालने की कोशिश कर रही थीं. लल्लन ने आगे बताया कि 'एक बार दिव्या मित्तल आईं और देखने के बाद उन्होंने कहा कि पानी यहां पहुंचाया जा सकता है. लोग कहते थे कि यहां पानी चढ़ाना संभव नहीं है, लेकिन उन्होंने कहा कि ऐसा कोई काम नहीं है जो संभव न हो.' इसके बाद गांव में पानी पहुंचाने की दिशा में काम आगे बढ़ा.

31 अगस्त 2023 को पहली बार घर-घर पहुंचा पानी

जल जीवन मिशन और हर घर नल योजना के तहत विशेष प्रयासों के बाद 31 अगस्त 2023 को लहुरियादह में पहली बार पाइपलाइन के जरिए पानी पहुंचा. गांव के लोगों ने बताया कि इसके बाद गांव की तस्वीर बदल गई. आज लगभग हर घर के पास पानी की टोंटी लगी है. अब लोगों को पहले की तरह झरने या पहाड़ी जलस्रोतों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. ग्रामीणों का कहना है कि कभी-कभी फॉल्ट, बिजली या पाइपलाइन में लीकेज के कारण दिक्कत आती है, लेकिन पहले जैसी पानी की किल्लत अब नहीं है.

बस एक डब्बे पानी में करते थे गुजारा

गांव में रहने वाली शीला ने हमें बताया कि पानी की समस्या के कारण परिवारों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती थी. उन्होंने कहा, 'पानी की बहुत तकलीफ थी. हम जंगल से पानी लाते थे. एक डब्बा पानी लाते थे, उसी में खाना बनाना, पीना और नहाना पड़ता था. फिर दोबारा पानी लेने जाना पड़ता था.' शीला के मुताबिक दिव्या मित्तल ने गांव में आकर लोगों की परेशानी खुद देखी और उसके बाद पानी पहुंचाने की व्यवस्था कराई. 

पानी भरने झरने पर जाते थे लोग

यूपी Tak की टीम ने जब रामकली से बात की तो उन्होंने बताया कि पानी लेने के लिए महिलाओं और ग्रामीणों को रात में भी पहाड़ी इलाकों की ओर जाना पड़ता था. उनका कहना था कि 'हमारे पुरखे पानी की तकलीफ देखते-देखते मर गए. हम लोग पहाड़ी पर झरने से पानी लेने जाते थे. रात-रात भर वहां सोना पड़ता था. कीड़े, बिच्छू, नाग और दूसरे जंगली जानवरों का डर रहता था.' रामकली ने कहा कि दिव्या मित्तल के आने के बाद घर-घर पानी पहुंचा तो लोगों को बड़ी राहत मिली. रामकली ने भावुक होकर उन्हें 'भगवान बनकर आई अधिकारी' तक कह दिया.

पानी आया तो गांव में शादियां भी बढ़ीं

लहुरियादह के ग्रामीणों के ने हमें और जानकारी देते हुए बताया कि पानी की कमी का असर सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी पर नहीं था, बल्कि सामाजिक जीवन पर भी पड़ता था. गांव में ही रहने वाले लल्लन प्रसाद यादव ने बताया कि पहले लोग पानी की समस्या के कारण इस गांव में अपनी बेटी की शादी करने से भी हिचकते थे. उन्होंने कहा, 'पहले यहां शादियां नहीं होती थीं. कौन अपनी बहू-बेटी यहां भेजेगा कि पानी के लिए जंगल जाना पड़े. अब पानी आने के बाद शादियां होने लगी हैं.' ग्रामीण इसे गांव की जिंदगी में आए बड़े बदलाव के तौर पर देखते हैं.

 ग्रामीण बोले- ‘हम उनका एहसान नहीं भूल पाएंगे’

दिव्या मित्तल के इस्तीफे की खबर के बाद ग्रामीण उन्हें याद कर रहे हैं. गांव में रहने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि 'बहुत तकलीफ हो रही थी. पानी के लिए भैंसोड़ और पहाड़ पर जाना पड़ता था. सात दिनों में नंबर आता था. एक मैडम आईं और उन्होंने घर-घर पानी दे दिया. हम चाहते हैं कि वह फिर से जिले में आ जाएं. उनके जैसे अधिकारी को हम लोग नहीं भूलेंगे.' वहीं शीला ने बताया कि दिव्या मित्तल ने पानी के साथ बिजली की समस्या पर भी काम किया और गांव के लोगों के लिए काफी कुछ किया. 

IAS दिव्या मित्तल को अब भी याद करते हैं ग्रामीण

रामकली ने बताया कि 'अगर वह रहतीं तो और भी व्यवस्था करतीं.' ग्रामीणों का कहना है कि दिव्या मित्तल ने लहुरियादह को केवल पानी नहीं दिया, बल्कि लोगों को एक नई जिंदगी दी. हालांकि गांव की कुछ समस्याएं अब भी बाकी हैं. ग्रामीणों ने बताया कि बच्चों के लिए स्कूल की सुविधा नहीं है और छोटे बच्चों को पढ़ने के लिए दूर जाना पड़ता है. खासकर लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित होती है. इसके बावजूद पानी की समस्या दूर होने को ग्रामीण अपने गांव के विकास की बड़ी शुरुआत मानते हैं. साथ ही वो आज भी अधिकारी दिव्या मित्तल को याद करते हैं.

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